टाटा स्टील फाउंडेशन की बैठक में हुआ खुलासा
नोआमुंडी/चाईबासा: पश्चिमी सिंहभूम जिले के दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले श्रवण बाधित बच्चों की शिक्षा को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। टाटा स्टील फाउंडेशन, नोआमुंडी द्वारा आयोजित पूर्व-प्रवेश (प्री-एडमिशन) बैठक में यह खुलासा हुआ कि कई श्रवण बाधित बच्चों के पास जन्म प्रमाण-पत्र और आधार कार्ड जैसे मूलभूत दस्तावेज तक उपलब्ध नहीं हैं।
बैठक का आयोजन कैंप स्कूल, नोआमुंडी परिसर में किया गया, जिसमें नोआमुंडी और जगन्नाथपुर प्रखंड के नौ गांवों से चिन्हित श्रवण बाधित बच्चों एवं उनके अभिभावकों ने भाग लिया। बैठक का उद्देश्य 10 बच्चों का जमशेदपुर स्थित कार्मेल बाल विहार (सीबीवी) में नामांकन सुनिश्चित करना था।
बैठक के दौरान कार्मेल बाल विहार की टीम ने प्रवेश प्रक्रिया, छात्रावास, शिक्षा एवं अन्य सुविधाओं की जानकारी दी। इसी दौरान यह तथ्य सामने आया कि कई बच्चों के पास जन्म प्रमाण-पत्र और आधार कार्ड नहीं हैं, जो किसी भी बच्चे के शिक्षा के अधिकार और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए अनिवार्य दस्तावेज हैं।
टाटा स्टील फाउंडेशन ने इस कमी को दूर करने की जिम्मेदारी लेते हुए अभिभावकों के साथ समन्वय बनाकर आवश्यक दस्तावेज तैयार कराने और प्रवेश प्रक्रिया पूरी कराने का निर्णय लिया। बैठक में टाटा स्टील के कॉरपोरेट कम्युनिकेशंस अधिकारी उदय प्रकाश सिंह, टीएसएफ यूनिट लीड संदीप कुमार केसरवानी, संतू दास, सिस्टर अमिका, छाया दास एवं भारतीय सांकेतिक भाषा की दुभाषिया सुश्री कोनिका उपस्थित रहीं।
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सराहनीय पहल, लेकिन कई सवाल भी…
टाटा स्टील फाउंडेशन की यह पहल निश्चित रूप से प्रशंसनीय है कि वह श्रवण बाधित बच्चों को गुणवत्तापूर्ण एवं समावेशी शिक्षा से जोड़ने का प्रयास कर रहा है। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया ने प्रशासनिक व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
आखिर जिले में ऐसे दिव्यांग बच्चे वर्षों तक बिना जन्म प्रमाण-पत्र और आधार कार्ड के कैसे रह गए? क्या पंचायत, आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य विभाग, शिक्षा विभाग और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े तंत्र को इन बच्चों की जानकारी नहीं थी? यदि थी, तो अब तक इनके दस्तावेज क्यों नहीं बन सके?
सरकार लगातार हर नागरिक की पहचान, शिक्षा और सरकारी योजनाओं तक पहुंच की बात करती है। ऐसे में श्रवण बाधित बच्चों जैसे सबसे संवेदनशील वर्ग का मूलभूत दस्तावेजों से वंचित रह जाना व्यवस्था की गंभीर खामी को उजागर करता है।
आज यदि टाटा स्टील फाउंडेशन आगे नहीं आता, तो संभव है कि ये बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अवसर से भी वंचित रह जाते। यह केवल एक संस्था की संवेदनशीलता नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र के लिए आत्ममंथन का विषय भी है।
समावेशी शिक्षा तभी सफल होगी, जब समाज के साथ-साथ प्रशासन भी यह सुनिश्चित करे कि कोई भी बच्चा अपनी पहचान और शिक्षा के अधिकार से वंचित न रहे।



