*The वॉयस खास*
*अबुआ अखाडा*
*नगर की बात*
आज *अबुआ अखाडा* मे
सोचा…. नगर लिखू या नरक लिखू?
अंधेरा लिखू या उजाला लिखू!
संधाड मारती नाली लिखू….,
या हल्की बरसात मे लबालब होती
गलियां लिखू…..
यह इस लिए कि..
पिछली रात सपने मे नगर निकाय चुनाव आया था!
सपना मन को भाया था..
सपने मे शहर… नरक से हज़ारो मील दूर था,
सड़क,गलिया सब सुंदर….सुंदर
सामने…..सपनो का सुंदर महल था…!
राजा और प्रजा मे मेल था..
सिस्टम नहीं कोई फेल था,
नगर का नियम मंत्री सुन रहे थे,
संत्री नहीं, राजा को सलाह दे रहे थे!
वर्तमान युग कि तरह कहाँ?
शासक प्रशासक खींचतान कर रहे थे..!
सपनो के नगर मे
पार्षद और सभासद
सब की बनती थी….
रोजाना!नहीं कोई रार ठनती थी..,
खैर…..
सपना तो सपना होता है हकीकत मे अब कहाँ सपने जैसा नगर मिलता है।
सपना टुटा…
आंखे खोलते ही नगर-नरक दिखता है,अँधेरी सड़क,और पीड़ित जनता!जहाँ घर के सताये दादा दादी को पार्क मे भी बैठने की जगह नहीं ..?
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बनाए गये पार्क मे कही फूल पत्ती तो कही चाय-वाय मिलती है…!
किससे कहे? नगर परिवार वाद की भेंट चढ़ गया.. या नेता जी के झूठे रिश्तो वाली नियत की..कैसे कहे?
तभी एक बंदा.. सत्ता-शासन को बेचना है जिसका धंधा!
एठते -वेठते कहता है…..हुंकार लगाते हुये…..
सावधान.. होशियार राजा-धिराज की सवारी पधार रही है..!
तभी भोपू ज़ोर से बजता है
शोर बड़ा गहरा होता है..,
शोर सुनते ही जनता के साथ.
जनप्रतिनिधि भी भागकर घर मे
छुप जाते है..!
इस शोर के बीच नगर की सड़को पर जो बच जाते है…..
वे अपनी आर्थिक योजनाओं के डर से चुप-चाप साथ निभाने को खडे हो जाते है….!
इस लिए सोचता हूँ *अबुआ अखाडा*
न लिखू….*क्यों नरक को नगर और नगर को नरक लिखू*…!
जनता का सर (मोबाईल मे) झुका हुआ है.. सपना सब का टुटा हुआ है….सर उठे…. लोग…… कुछ तो बोले….
*सेटिंग-गेटिंग से कहाँ भविष्य बनता है…आप आज राजा की ख़ुशी के लिए.. बे-मन से हॅसते है.. और भविष्य आपका सदियों तक रोता है… भविष्य आपका सदियों तक रोता है….*
*The वॉयस खास*
*अबुआ अखाडा*
के लिए
*Jitendra jyotishi*



