‘अबुआ अखाड़ा’ के लिए विशेष रिपोर्ट | चाईबासा
झारखंड के महानायक, ‘धरती आबा’ भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि हमारे लिए महज एक तिथि नहीं, बल्कि यह स्वाभिमान, संघर्ष और अस्मिता के स्मरण का दिन है। चाईबासा, जहाँ बिरसा मुंडा ने प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण कर चेतना का अंकुर पाया था, आज उसी पावन धरती पर व्यवस्था का स्वरूप अत्यंत चिंताजनक है।
व्यवस्था की कलई: नगर प्रतिनिधियों की अनुपस्थिती
9 जून 2026 को भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित सरकारी कार्यक्रमों में चाईबासा नगर परिषद की ‘छोटी सरकार’ यानी नगर के चेयरमेन और पार्षदों की अनुपस्थिति ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
हालाँकि, भाजपा समर्थित कार्यक्रमों में कुछ पार्षद (सन्नी पासवान) और पूर्व पार्षद (पवन शर्मा) जरूर दिखे, लेकिन प्रशासनिक कार्यक्रमों में शहर के जनप्रतिनिधियों का नदारद होना शहर की व्यवस्था पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न है। क्या यह जनप्रतिनिधियों की आपसी खींचतान है, या व्यवस्था में व्याप्त उदासीनता?
चेयरमेन का दावा: ‘हमें सूचना ही नहीं मिली’
जब हमने इस बाबत नगर परिषद के चेयरमेन नितिन प्रकाश से पूछा, तो उनका कहना था कि उन्हें कार्यक्रम की सूचना ही नहीं दी गई। यदि शहर के प्रथम नागरिक, यानी चेयरमेन को ही आधिकारिक कार्यक्रमों की जानकारी नहीं दी जाती है, तो यह स्पष्ट करता है कि जिला प्रशासन और नगर निकाय के बीच तालमेल का कितना अभाव है। यह स्थिति पूरे नगर को अपमानित करने वाली है।
एक और विडंबना गांधी मैदान की दुर्दशा और प्रशासनिक फाइलों की धूल
सिर्फ बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि ही नहीं, चाईबासा का गांधी मैदान भी प्रशासन की बेरुखी का शिकार है। वहां से गांधी जी की प्रतिमा का हटना और मैदान की दयनीय स्थिति पर वार्ड पार्षद सन्नी पासवान (धर्मवीर पासवान) ने अपनी पीड़ा व्यक्त की है। गौरतलब है कि इस मामले में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश ने भी गंभीर शिकायत दर्ज कराई है।
मैदान का सड़क स्तर से नीचे होना और प्रतिमा के लिए महीनों से हो रही प्रतीक्षा यह बताती है कि चाईबासा में विकास और श्रद्धा दोनों ही प्रशासनिक फाइलों की धूल में दब चुके हैं।
बड़ा सवाल?
जब नगर के जनप्रतिनिधि खुद को ‘अनभिज्ञ’ बताकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने लगें,या उन्हें ईगो वश महत्वपूर्ण कार्यक्रमो से दूर रखा जाये तो जनता का विश्वास डगमगाना स्वाभाविक है। भगवान बिरसा मुंडा की पुण्यतिथि पर हुई यह उपेक्षा केवल एक कार्यक्रम की विफलता नहीं है, बल्कि यह उन मूल्यों का अपमान है, जिन पर झारखण्ड की नींव टिकी है।
बीते 26 वर्षों की राजनीतिक विफलता का ही परिणाम है कि जिस विद्यालय में धरती आबा ने ज्ञानार्जन किया, उसे आज तक राष्ट्रीय स्मारक घोषित नहीं किया जा सका। यह इस बात का प्रमाण है कि हमारे लिए महापुरुषों के विचार केवल भाषणों तक सीमित हैं।
लेखक:
जितेंद्र ज्योतिषी
‘The वॉयस खास’ | अबुआ अखाड़ा



