राज्यसभा चुनाव और झारखंड की सियासत

भ्रम और यथार्थ’

​झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए संपन्न हुए चुनाव परिणाम महज अंकों का गणित नहीं हैं, बल्कि यह राज्य की राजनीति में जमीनी हकीकत और सत्ता के गलियारों में व्याप्त ‘भ्रम’ के बीच के फासले को दर्शाते हैं। एक तरफ झामुमो ने अपने प्रत्याशी बैद्यनाथ राम को 31 मतों के साथ सुरक्षित जीत दिलाई, तो दूसरी तरफ एनडीए समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नाथवानी की जीत ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। इस चुनाव में कांग्रेस की हार, उसके लिए केवल एक सीट का नुकसान नहीं, बल्कि एक गहरी संगठनात्मक आत्म-समीक्षा का आह्वान है।

​आंकड़ों की बाजीगरी को देखें, तो चुनाव से पहले विधानसभा के समीकरण पूरी तरह से ‘इंडिया’ गठबंधन के पक्ष में थे। झामुमो, कांग्रेस, राजद और भाकपा माले के पास कुल 56 विधायकों का अभेद्य किला था। गणितीय दृष्टिकोण से, गठबंधन के दोनों उम्मीदवारों की राह आसान थी। लेकिन चुनावी नतीजों ने इस बहुमत को आईना दिखा दिया।

​मतों का विवरण इस कड़वे सच को उजागर करता है कि कैसे 56 विधायकों का दावा करने वाला खेमा बिखर गया:

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  • बैद्यनाथ राम (झामुमो): 31 मत (जीत)
  • परिमल नाथवानी (निर्दलीय/एनडीए): 28 मत (जीत)
  • प्रणव झा (कांग्रेस): 21 मत (हार)

​इस परिणाम में सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल कांग्रेस की हार नहीं है, बल्कि वह ‘क्रॉस वोटिंग’ और मतों के अमान्य (Invalid) होने की प्रक्रिया है। परिमल नाथवानी के पक्ष में पड़े 2 मतों का अमान्य होना और कांग्रेस के खाते में पड़ने वाला 1 मत रद्द होना, इस बात का प्रमाण है कि गठबंधन के भीतर न केवल अनुशासनहीनता थी, बल्कि भीतरघात की संभावनाओं ने भी अपनी जड़ें जमा ली थीं। 24 विधायकों का बल रखने वाले एनडीए ने जिस कुशलता से समीकरणों को अपने पक्ष में मोड़ा, वह उनके रणनीतिक प्रबंधन की परिपक्वता को दर्शाता है।

कांग्रेस के लिए यह ‘जोर का झटका’ संकेत है कि कागजों पर दिखने वाला बहुमत जब तक जमीनी स्तर पर समन्वय और भरोसे में तब्दील नहीं होता, तब तक सत्ता का गणित कभी भी उलट सकता है। इंडिया गठबंधन के लिए यह चुनाव एक वेक-अप कॉल है। यदि गठबंधन अपने विधायकों के मतों को सुरक्षित नहीं रख पा रहा है, तो आने वाले बड़े चुनावों में उसे अपने अस्तित्व को बचाने के लिए नए सिरे से रणनीति बनानी होगी।

​अंततः, यह चुनाव परिणाम झारखंड की राजनीति में व्यक्तिगत झुकाव और रणनीतिक दांव-पेच की जीत को रेखांकित करता है। यह स्पष्ट हो गया है कि दलीय संख्या बल से ऊपर उठकर, अंतरात्मा की आवाज या राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं, किसी भी चुनाव के रुख को बदलने की ताकत रखती हैं। अब देखना यह है कि कांग्रेस अपनी इस ‘विफलता’ से क्या सीख लेती है और क्या गठबंधन अपनी बिखरी हुई साख को पुनर्गठित कर पाता है।

The Voice Live 24x7

The Voice Live 24x7 संपादक प्रोफाइल जीतेन्द्र ज्योतिषी वर्तमान में the voice के प्रधान सम्पादक के साथ 'झारखंड जर्नलिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन'के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं..