कोल्हान का पहला ‘कमल’: राधे सुम्बुरुई, जिनकी बढ़ती लोकप्रियता ही बन गई उनकी मौत की वजह

कोल्हान के राजनीतिक इतिहास में कुछ पन्ने शौर्य, संगठन और समर्पण के लिखे हैं, तो कुछ पन्ने बेहद दर्दनाक और अनसुलझे रहस्यों के भी हैं..

झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम का कोल्हान क्षेत्र, जिसे कभी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए एक कठिन गढ़ माना जाता था, वहाँ कमल खिलाने वाले और भाजपा का खाता खोलने वाले पहले आदिवासी जननायक थे— राधे सुम्बुरुई।

​आज उनकी पुण्यतिथि है। आइए जानते हैं कोल्हान के उस जांबाज नेता की कहानी, जिसने बेहद कम उम्र में राजनीति के शिखर को छुआ, लेकिन जिसका अंत एक गहरी राजनीतिक साजिश के तहत बेहद दर्दनाक रहा।
छात्र राजनीति से कोल्हान के ‘प्रथम भाजपा विधायक’ बनने का सफर
​चक्रधरपुर के लोटा पहाड़ में जन्मे राधे सुम्बुरुई की शुरुआती शिक्षा चाईबासा के एस.पी.जी. मिशन स्कूल से हुई। आगे चलकर उन्होंने टाटा कॉलेज, चाईबासा से स्नातक किया और फिर रांची विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में एम.ए. की डिग्री ली।
​राधे जी के भीतर नेतृत्व के गुण छात्र जीवन से ही दिखने लगे थे। वे टाटा कॉलेज छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए। उस दौर में कोल्हान के छात्रों को उच्च शिक्षा के लिए भटकना पड़ता था। राधे सुम्बुरुई ने छात्र हितों के लिए एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया और चाईबासा में स्नातकोत्तर (पी.जी.) की पढ़ाई शुरू करवाने में केंद्रीय भूमिका निभाई।

इतिहास रचने वाला साल: 1985

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“जब कोल्हान में भाजपा के विचार को स्थापित करना बेहद मुश्किल था, तब 1985 के बिहार विधानसभा चुनाव में महज 26-27 साल के इस युवा आदिवासी चेहरे ने चाईबासा सीट से चुनाव जीतकर सबको चौंका दिया। वे कोल्हान क्षेत्र से भाजपा के पहले विधायक बने।”
​इसके बाद 1986 से 1988 तक वे सिंहभूम जिला के भाजपा अध्यक्ष रहे और गांव-गांव घूमकर आदिवासियों के बीच संगठन को मजबूत किया।
जनसेवा, खेल और घनिष्ठ मित्रता
​राधे सुम्बुरुई सिर्फ एक राजनेता नहीं थे, बल्कि समाज को जोड़ने वाले व्यक्ति थे। वे आदिवासी समाज की कुरीतियों के खिलाफ थे और सामाजिक समरसता के पक्षधर थे। युवाओं को जोड़ने के लिए वे फुटबॉल खेल का आयोजन and संरक्षण करते थे।
​उस दौर में भाजपा के वरिष्ठ नेता अनूप सुल्तानिया और राधे सुम्बुरुई की दोस्ती पूरे क्षेत्र में मिसाल हुआ करती थी। दोनों ने मिलकर कोल्हान में संगठन की नींव को सींचा था। राजनीतिक गलियारों और जनता के बीच यह चर्चा आम थी कि यदि राधे सुम्बुरुई जीवित रहते, तो अपनी लोकप्रियता और काबिलियत के दम पर आगे चलकर झारखंड के मुख्यमंत्री के पद तक पहुंच सकते थे।
​पीठ पर वार और इतिहास की पहली राजनीतिक हत्या
​8 जुलाई 1993 का वह दिन कोल्हान के इतिहास का सबसे काला दिन साबित हुआ। जो जननायक हमेशा जनता के हक के लिए सीना तानकर खड़ा रहा, उसकी पीठ पर कायरतापूर्वक वार करके हत्या कर दी गई।
​यह कोल्हान के इतिहास की पहली राजनीतिक हत्या थी, जिसने पूरे बिहार-झारखंड की राजनीति को हिलाकर रख दिया। एक उभरते हुए कद्दावर आदिवासी नेतृत्व को हमेशा के लिए खामोश कर दिया गया।
​अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब
​राधे सुम्बुरुई की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब उनकी पार्थिव देह चाईबासा पहुंची, तो पूरा इलाका रो पड़ा। उनके दाह संस्कार में रिकॉर्ड भीड़ उमड़ी थी। हजारों-हजार की संख्या में लोग अपने चहेते नेता को अंतिम विदाई देने स्वतः स्फूर्त चले आए थे। आँखों में आंसू और दिलों में आक्रोश लिए वह भीड़ कोल्हान के इतिहास में किसी भी नेता की अंतिम यात्रा में जुटने वाली सबसे बड़ी भीड़ में से एक थी।

​आज राधे सुम्बुरुई हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन कोल्हान के ग्रामीण और आदिवासी समाज में भाजपा को स्थापित करने का उनका योगदान हमेशा जीवित रहेगा। उनका जीवन और उनका असमय चला जाना, आज भी क्षेत्र के लोगों को भावुक कर जाता है। राष्ट्र और समाज के प्रति उनका समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा का स्रोत रहेगा। कोल्हान के पहले कमल-पुष्प राधे सुम्बुरुई को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन!

The Voice Live 24x7

The Voice Live 24x7 संपादक प्रोफाइल जीतेन्द्र ज्योतिषी वर्तमान में the voice के प्रधान सम्पादक के साथ 'झारखंड जर्नलिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन'के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं..