- चाईबासा का ‘थर्सडे फाइट’: एक तरफ महंगाई का रोना, दूसरी तरफ पानी-बिजली का पंचनामा!
चाईबासा, 6 मई 2026: चाईबासा की धरती कल यानी 7 मई को गवाह बनने वाली है एक अनोखे ‘पॉलिटिकल फ्रेंडली मैच’ की। यहाँ जनता प्यासी है, पसीने से तर-बतर है और जेब खाली है, लेकिन राहत की उम्मीद न पालें, क्योंकि कल शहर की सड़कों पर ‘आंदोलनों का ट्रैफिक जाम’ होने वाला है। पक्ष और विपक्ष, दोनों ने कमर कस ली है—मुद्दे अलग हैं, झंडे अलग हैं, लेकिन टाइमिंग बिल्कुल एक!
झामुमो का ‘तेल’ निकालो आंदोलन: “महंगाई डायन खाए जात है”
सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने ठाना है कि कल पुराना उपायुक्त कार्यालय के सामने केंद्र की भाजपा सरकार का ‘तेल’ निकाला जाएगा। जिला प्रवक्ता बुधराम लागुरी ने साफ कह दिया है कि देश में महंगाई इतनी बढ़ गई है कि आम आदमी का बजट अब ‘ब्लैक होल’ में समा चुका है।
लागुरी का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल भले ही सस्ता हो, पर यहाँ रसोई गैस और पेट्रोल के दाम ‘एवरेस्ट’ की चढ़ाई कर रहे हैं। झामुमो का तर्क सीधा है—अगर जेब खाली है, तो इसके जिम्मेदार दिल्ली वाले हैं। कल 11 बजे झामुमो कार्यकर्ता ‘महंगाई’ को धरना स्थल पर बिठाकर उसका हिसाब मांगेंगे।
भाजपा का ‘पावर कट’ प्रदर्शन: “नल है पर जल कहाँ है?”
इधर झामुमो दिल्ली की ओर उंगली उठा रही है, उधर भाजपा ने रांची की ओर मोर्चा खोल दिया है। भाजपा का कहना है कि “महंगाई का रोना बाद में रोना, पहले ये बताओ कि चाईबासा की जनता प्यासी क्यों है?” गौशाला चौक से लेकर उपायुक्त कार्यालय तक भाजपा एक विशाल जन-जुलूस निकालने वाली है।
प्रदेश उपाध्यक्ष गीता कोड़ा ने तो सीधा ‘गुगली’ फेंकी है। उनका कहना है कि राज्य सरकार अपनी नाकामी छिपाने के लिए केंद्र पर दोष मढ़ रही है। फंड तो मिला, पर ‘हर घर नल’ में जल की जगह शायद हवा निकल रही है। गीता बालमुचु ने भी सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि योजनाएं सिर्फ कागजों पर ‘पैर’ फैलाकर सो रही हैं। कल इस आंदोलन में मधु कोड़ा और चंपई सोरेन जैसे दिग्गजों की मौजूदगी ने मुकाबले को ‘हाई वोल्टेज’ बना दिया है।
जनता का हाल: “इधर कुआँ, उधर खाई, बीच में चाईबासा भाई”
कल चाईबासा मुख्यालय में दिलचस्प नजारा होगा:
- एक तरफ झामुमो कहेगी— “भाजपा ने जेब लूटी!”
- दूसरी तरफ भाजपा कहेगी— “झामुमो ने प्यासा मारा!”
दोनों दल एक ही दिन, लगभग एक ही जगह (उपायुक्त कार्यालय) पर अपनी अपनी ‘दुखभरी दास्तान’ सुनाएंगे। सत्ता पक्ष कहता है केंद्र दोषी है, विपक्ष कहता है राज्य दोषी है। बीच में फंसी जनता सोच रही है कि कल आंदोलनों की भीड़ में उसे पीने का पानी मिलेगा या सिर्फ नेताओं के भाषणों की ‘ठंडी फुहारें’।



