पश्चिमी सिंहभूम: माननीयों का मौन और जनता की ख़ामोशी… विकास का ‘रॉकेट’ या बड़े तूफान की आहट?
चाईबासा: पश्चिमी सिंहभूम की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक तस्वीर इन दिनों एक अजीबोगरीब विरोधाभास पेश कर रही है। जिले के प्रशासनिक गलियारों में विकास के ‘रॉकेट’ की रफ्तार पर सवार होने के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर पसरा राजनीतिक सन्नाटा और आम जनमानस की गहरी खामोशी कई अनुत्तरित प्रश्न खड़े कर रही है। लोकतंत्र के लिए यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि जब जनप्रतिनिधि मौन हो जाएं और जनता चुप, तो समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था में संवाद का सेतु टूट चुका है।
नेतृत्व का शून्य और शिथिल पड़ती मशीनरी
जिले के कद्दावर राजनैतिक चेहरे और मंत्री दीपक बिरुआ का अस्वस्थ होना निश्चित रूप से एक बड़ा अभाव है। किंतु, सवाल यह उठता है कि क्या एक व्यक्ति की अनुपस्थिति में पूरी राजनीतिक मशीनरी का शिथिल पड़ जाना जायज है? ‘माननीयों’ का लंबे समय से एक मंच पर न आना और सामूहिक विमर्श का अभाव साफ दर्शाता है कि जिले की प्राथमिकताएं अब जनहित के बजाय व्यक्तिगत राजनीति तक सिमट गई हैं। जब निगरानी करने वाली आंखें यानी जनप्रतिनिधि ही बंद हों, तो विकास का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुँचना संदिग्ध हो जाता है।
‘छोटी सरकार’ और जिला परिषद की स्थिति चिंताजनक
जमीनी लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी कही जाने वाली ‘नगर निकाय’ और ‘जिला परिषद’ की स्थिति भी जिले में संतोषजनक नहीं है। नगर निकाय चुनावों के बाद जिस उत्साह और समन्वय की उम्मीद थी, वह अंदरूनी खींचतान की भेंट चढ़ गया है। वहीं, जिला परिषद की बैठकों पर उठते सवाल और अनियमितता यह बताते हैं कि विकास की योजनाओं का विकेंद्रीकरण अब केवल एक कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है।
खामोशी के मायने: संतोष या सुलगता आक्रोश?
राजनीति का अर्थ केवल चुनावी समीकरणों को साधना नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं को स्वर देना भी है। वर्तमान में पश्चिमी सिंहभूम की जनता जो खामोश दिख रही है, उसके गहरे अर्थ हो सकते हैं। क्या जनता व्यवस्था से पूरी तरह संतुष्ट है, या फिर उसका तंत्र से विश्वास उठ चुका है? माननीयों की यह रहस्यमयी चुप्पी किसी बड़े सियासी ‘राज’ की ओर इशारा कर रही है या फिर यह आने वाले किसी बड़े राजनीतिक तूफान की पूर्व-सूचना है?
समय की मांग: जिम्मेदार तोड़ें चुप्पी
जनप्रतिनिधियों और जनता के बीच बढ़ती यह दूरी और रहस्यमयी ख़ामोशी जिले के भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है। वक्त आ गया है कि जिम्मेदार अपनी सक्रियता दिखाएं और जनता के बीच जाकर इस संवादहीनता को खत्म करें, वरना यह सन्नाटा आने वाले समय में किसी बड़ी उथल-पुथल का गवाह बन सकता है।
प्रस्तुति:
जितेंद्र ज्योतिषी
अबुआ अखाड़ा (The वॉयस खास)



