ग्रामीणों की एकजुटता के आगे प्रशासन ने बदला निर्णय,
चाईबासा, झारखंड
झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के खूंटपानी प्रखंड स्थित सालीगुटू गाँव के ग्रामीणों ने अपनी जमीन और अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतंत्र की एक बड़ी मिसाल पेश की है। ग्रामीणों ने एक संगठित आंदोलन के जरिए जिला प्रशासन की उस प्रस्तावित योजना को निरस्त करवा दिया है, जिसके तहत गाँव की 3 एकड़ 84 डिसमिल उपजाऊ भूमि पर विस्थापितों के लिए पुनर्वास कॉलोनी बनाने का निर्णय लिया गया था।
क्या था पूरा मामला?
जिला प्रशासन द्वारा खूंटपानी के सालीगुटू गाँव में एक पुनर्वास परियोजना के लिए भूमि चिन्हित की गई थी। इस योजना के तहत जिले के विभिन्न हिस्सों में सरकारी परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वाले परिवारों को यहाँ बसाने का प्रस्ताव था। हालाँकि, प्रशासन ने इस निर्णय से पहले स्थानीय ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति नहीं ली थी, जिसे लेकर ग्रामीणों में गहरा आक्रोश था।
ग्रामीणों का संघर्ष और ग्राम सभा की भूमिका
अपनी भविष्य की आजीविका और गाँव के हितों को खतरे में देखते हुए, स्थानीय लोगों ने एकजुट होकर एक विशेष ग्राम सभा बुलाई। खूंटपानी प्रखंड प्रमुख श्री सिद्धार्थ होनहागा ने इस मुद्दे को मजबूती से उठाते हुए ग्राम सभा के प्रस्तावों को न केवल सार्वजनिक किया, बल्कि इसे समाचार पत्रों के माध्यम से सरकार और जिला प्रशासन तक प्रभावी ढंग से पहुँचाया।
ग्रामीणों का तर्क था कि पेसा (PESA) कानून के तहत उनकी जमीन पर निर्णय लेने का अधिकार केवल ग्राम सभा को है। इस मुखर विरोध के बाद जिला उपायुक्त ने जनभावनाओं और ग्राम सभा की रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए इस पुनर्वास योजना को तत्काल प्रभाव से निरस्त करने का आदेश जारी किया।
ग्रामतंत्र की जीत
इस जीत को राज्य में ‘ग्राम सभा की सर्वोच्चता’ की एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों ने जिला प्रशासन के इस सकारात्मक कदम का स्वागत करते हुए इसे जनहित में लिया गया निर्णय बताया है।Post center
इस सफलता ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि ग्रामीण अपनी संस्कृति, जमीन और अधिकारों के प्रति जागरूक हों, तो स्थानीय स्तर पर विकास के नाम पर होने वाले मनमाने फैसलों को बदला जा सकता है। यह घटना देशभर के उन समुदायों के लिए एक प्रेरणा है जो अपनी जमीन और सामुदायिक अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
ग्राम सभा की शक्ति,विवादास्पद पुनर्वास योजना रद्द



ग्रामतंत्र की जीत
