पत्रकार की पीड़ा और पुकार
इन दिनों शहर के चौराहों और सार्वजनिक स्थलों पर जब भी किसी महापुरुष की प्रतिमा की बात चलती है, तो मन में एक टीस सी उठती है और अनकही पीड़ा महसूस होती है। आज विडंबना यह है कि जिन महापुरुषों ने अपना पूरा जीवन समाज, देश और न्याय की लड़ाई में लगा दिया, उनकी स्मृतियों को भी संकुचित राजनीति और दलीय चौखटों में बांधने की कोशिश की जा रही है।
इससे कभी-कभी लगता है क्या हमारे महान सपूत और विभूतियां सिर्फ सियासत की रोटियां सेकने भर का जरिया रह गए हैं? एक पत्रकार के रूप में यह टीस इन दिनों मेरे मन को लगातार कचोट रही है…
आखिर हम कब तक अपनी ही ऐतिहासिक धरोहरों और वीर बलिदानियों के सम्मान को लेकर राजनीति का तमाशा देखते रहेंगे? आज पत्रकार की पीड़ा ‘अबुआ-अखाड़ा’ का प्रारम्भ राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी से करते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के चाईबासा आगमन के ऐतिहासिक 125 साल आगामी 6 अक्टूबर 2026 को पूरे होंगे। 6 अक्टूबर 1921 को चाईबासा के वर्तमान गांधी मैदान में उनका आगमन हुआ था! आज वर्तमान समय के मुहाने पर जब हम शहर की वर्तमान कुव्यवस्था और उदासीनता को देखते हैं, तब कुछ पुरानी घटनाएं याद आ जाया करती हैं… जैसे गांधी मैदान से उनकी प्रतिमा को हटाये जाने के मामले को देखते हैं तो यह पीड़ा और गहरी हो जाती है। एक तरफ प्रतिमा को लेकर बहुत शोर है तो दूसरी तरफ मौन।
बात चाहे महात्मा गांधी की हो, या फिर जल-जंगल-ज़मीन के सच्चे रक्षक रहे अमर शहीद पोटो हो की, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत से डटकर लोहा लिया था। पोटो हो और उनके साथियों के इतिहास को भले इतिहास के पन्नों में वो स्थान नहीं दिया गया हो, पर इस स्वर्णिम इतिहास को सदियां नहीं भूलेंगी…
प्रतिमा विवाद के बीच झारखंड निर्माता दिशोम गुरु शिबू सोरेन का कोल्हान और चाईबासा से आत्मीय लगाव भी किसी से छिपा नहीं है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। उनका अलग राज्य का लंबा संघर्ष आज भी कोल्हान के हर कोने में सांस ले रहा है। लेकिन महापुरुषों के योगदान के विपरीत, प्रतिमाओं और स्मारकों को लेकर जिस तरह का विवाद खड़ा किया जाता है और राजनीतिक माहौल बनाया जाता है, वह लोगों के बौद्धिक स्तर को ही दर्शाता है।
यहाँ मैं स्पष्ट कर दूं कि ‘पत्रकार की पीड़ा – अबुआ अखाड़ा’ का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति या वर्ग की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है, बल्कि यह इस माटी के एक सेवक और पत्रकार की अंतरात्मा की आवाज है।
धरती के एक सेवक बतौर पत्रकार और फिल्म निर्देशक के रूप में मैंने अमर शहीद पोटो हो के ओजस्वी इतिहास को पर्दे पर लाने के लिए ‘आदि विद्रोही’ (स्पेशल जूरी अवार्ड प्राप्त) जैसी फिल्म का निर्माण किया है, ताकि उनका बलिदान जन-जन तक पहुंचे। आने वाली नई पीढ़ियां इतिहास को जानें और इस बात को भी समझें कि राज्य गठन से पूर्व किस तरह सेरेंगसिया में झाड़झंकार में छुपे शहीद स्मारक तक वर्तमान कैबिनेट मंत्री दीपक बिरुआ मोटरसाइकिल यात्रा कर दुर्गम रास्तों के सहारे पहुँचा करते थे! और हर वर्ष अमर शहीदों को नमन और सम्मान देने का काम उनके द्वारा किया जाता था।
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उस दौर में मैं पत्रकारिता में नहीं था, राजनीतिक दल का सदस्य था! यहाँ इस स्थान और शहीदों के सम्मान के लिए वर्तमान झामुमो नेता बुधराम लागूरी और स्व. जीतेन्द्र नाथ सुलंकी के योगदान को भी भूलना आसान नहीं है! सेरेंगसिया के मामले में शहीदों की अमर भूमि का वर्तमान स्वरूप और शहीदों का सम्मान दिशोम गुरु शिबू सोरेन के समर्थन से उस दौर में सरकार चलाने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की देन है। सेरेंगसिया के साथ कोल्हान से स्व. गुरुजी की महत्वपूर्ण यादें भी जुड़ी हैं। बिहार के दौर में वर्ष 1996 में मुझे गुरुजी के संग कोल्हान में शिक्षा का अलख जगाने के संस्मरण भी याद हैं। जल-जंगल-ज़मीन के उस ऐतिहासिक आंदोलन को अपनी कलम से लिखने का गौरव भी मुझे प्राप्त रहा है… इन सभी संस्मरणों के बीच वर्तमान प्रतिमा विवाद मन को बड़ी पीड़ा देता है।
एक स्पष्ट सुझाव और प्रस्ताव: ‘सम्मान विहार’ का निर्माण
आज ‘अबुआ अखाड़ा’ में बतौर एक जागरूक नागरिक और पत्रकार के रूप में मैं सभी सम्मानित सदस्यों और नागरिक वृंदों से यह सवाल पूछना चाहता हूँ और बहुमूल्य सलाह भी चाहता हूँ—
क्या हम इसी तरह महापुरुषों के नाम पर राजनीति होते देखते रहेंगे, या फिर इस कुव्यवस्था को खत्म करने के लिए कोई ठोस और स्थायी पहल करेंगे?
चलो पहल करते हैं! इस वैचारिक भंवर से बाहर निकलने और शहर की सूरत बदलने के लिए मेरा एक स्पष्ट सुझाव और प्रस्ताव है, जिस पर आप सभी प्रबुद्ध पाठकों को विचार करना चाहिए:
- ‘सम्मान विहार’ का निर्माण: चाईबासा के जुबली तालाब का नाम बदलकर ससम्मान ‘सम्मान विहार’ कर दिया जाए। तालाब में मौजूद अलग-अलग टापुओं पर कोल्हान के महान वीर सपूत पोटो हो, बागुन सुम्ब्रुरुई, अमर शहीद देवेंद्र मांझी, मरंग गोमके जयपाल सिंह मुंडा और झारखंड के गांधी कहे जाने वाले गुरुजी शिबू सोरेन की भव्य आदमकद प्रतिमाएं स्थापित की जाएं।
- चौक-चौराहों पर उचित सम्मान: वर्तमान में बिना किसी विवाद के जहाँ गुरुजी की प्रतिमा लगाने का प्रस्ताव है, वह यथावत रहे। इसके साथ ही, अमर शहीद पोटो हो की आदमकद प्रतिमा तांबो चौक या मतकमहातु कोल्हान चौक पर लगाई जाए, तथा स्व. बागुन सुम्ब्रुरुई जी की प्रतिमा के लिए पूर्व में लोगों की चर्चाओं में तय हुए रतनलाल पेट्रोल पंप के सामने के स्थल को अंतिम रूप दिया जाए।
यदि हम ऐसा करते हैं, तो यह सभी स्थल महज एक चौराहा या तालाब नहीं रहेगा, बल्कि यह प्रेरणा, नमन और झारखंड के गौरवशाली इतिहास का एक ऐसा दर्शनीय स्थल बनेगा जहाँ नई पीढ़ी अपनी जड़ों को जान सकेगी और लोग सपरिवार आकर सुकून महसूस कर सकेंगे।
आइए, राजनीति से ऊपर उठकर प्रतिमा प्रकरण को एक रचनात्मक दिशा दें। पूरे मसले पर आपकी क्या राय है, हमें जरूर बताएं—व्हाट्सएप करें, क्योंकि शहर का भविष्य और महापुरुषों का असली सम्मान केवल आप सबकी सामूहिक सोच और पहल से ही संभव है।
The वॉयस खास
अबुआ अखाड़ा के लिए
जितेन्द्र ज्योतिषी (Jitendra Jyotishi)
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