सड़क सुरक्षा, ‘फोटो-ऑप’ की संस्कृति और सेवा का खोता अर्थ
लेखक: जितेंद्र ज्योतिषी
सड़क दुर्घटनाएं केवल सांख्यिकी (Statistics) का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये उन परिवारों की सिसकती चीखें हैं जो एक पल में बिखर जाते हैं। दुर्भाग्यवश, आज सड़क सुरक्षा और दुर्घटना पीड़ितों की मदद का मुद्दा एक ‘फोटो-ऑप’ (दिखावे का अवसर) बनकर रह गया है। शासन-प्रशासन द्वारा दिए जाने वाले सम्मान और सोशल मीडिया पर वायरल होती ‘सेल्फी-संस्कृति’ के शोर में, निस्वार्थ सेवा का वास्तविक चेहरा कहीं ओझल होता जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में सम्मान और पुरस्कारों का जो चलन बढ़ा है, उसे यदि हम पश्चिम सिंहभूम के आईने में देखें, तो एक कड़वी सच्चाई सामने आती है। मंझारी की वह हृदयविदारक घटना आज भी एक अनुत्तरित प्रश्न बनकर खड़ी है, जहां तेल टैंकर की चपेट में आने से मासूमों ने जान गंवाई। उस त्रासदी के बाद सोशल मीडिया पर संवेदनाओं का सैलाब तो आया—रील, वीडियो और मुआवजे की मांग की औपचारिकताएं भी खूब हुईं। लेकिन, एक बड़ी ‘अनुपस्थिति’ वहां महसूस की गई।
तथ्य यह है कि उस विपदा के बाद प्रशासनिक और
कानूनी दांव-पेच से गुजरने के लिए पीड़ित परिवार के साथ ढाल बनकर खड़ा होने वाला, उनका हाथ थामने वाला कोई ‘सड़क मित्र’ या कार्यकर्ता वहां नजर नहीं आया। यह केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि एक गरीब परिवार का आधार छिन जाने का मामला था। ‘रील’ के शौकीन वे ‘सड़क सुरक्षा योद्धा’, जो अक्सर सम्मान समारोहों में चमकते नजर आते हैं, पीड़ित परिवार को सरकारी लाभ की दहलीज तक पहुंचाने में नदारद दिखे। यह मंझारी का मौन, सड़क सुरक्षा के उन दावों की पोल खोलता है जो केवल दिखावे तक सीमित हैं।
Post center
इसी तरह, 29 जून 2026 को ट्रैक्टर दुर्घटना में जान गंवाने वाली शिक्षिका का प्रसंग हो, या फिर अस्पताल में भर्ती घायलों को सांत्वना देने की बात—सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले तथाकथित ‘योद्धाओं’ की संवेदनाएं प्रायः घटनास्थल से आगे नहीं बढ़ पातीं। सड़क सुरक्षा के नाम पर प्रोत्साहन मिलना अच्छी बात है, लेकिन धरातल पर काम करने वालों की कमी खटकती है। आज भी नाबालिगों द्वारा बिना नंबर वाली हाई-स्पीड बाइक के खतरों के प्रति कोई ठोस जागरूकता अभियान कहीं दिखाई नहीं देता।
अब समय आ गया है कि हम ‘सम्मान’ की परिभाषा को पुनर्परिभाषित करें। महज फोटो खिंचवाने या अल्प राहत के दिखावे को समाज सेवा नहीं कहा जा सकता। भविष्य में ऐसे पुरस्कारों का असली हकदार वह व्यक्ति होना चाहिए, जिसने सड़क पर तड़पते घायलों को उठाकर न केवल समय पर अस्पताल पहुंचाया हो, बल्कि उनके बचने की संभावनाओं को बढ़ाया हो। सम्मान उस प्रहरी को मिलना चाहिए जो अस्पताल से बाहर निकलकर, पीड़ित परिवार के साथ डीसी-एसपी के कार्यालयों की दौड़ लगाकर उन्हें सरकारी आपदा राहत और उनके अधिकारों का लाभ दिला सके।
सड़क सुरक्षा कोई ‘इवेंट मैनेजमेंट’ का काम नहीं, बल्कि एक मानवीय जिम्मेदारी है। प्रशासन और परिवहन विभाग को अब अपनी चयन प्रक्रिया बदलनी होगी। उन्हें उन डॉक्टरों, नर्सों और विधिक सेवा के कर्मचारियों को भी पहचानना और सम्मानित करना चाहिए, जो घायलों और उनके परिजनों के लिए उस समय मसीहा बनते हैं जब रील बनाने वाली भीड़ वहां नहीं होती।
जब तक हम ‘फोटो खिंचवाने वाले काम’ और ‘असली सेवा’ के बीच का अंतर नहीं समझेंगे, तब तक सड़क सुरक्षा का यह अभियान केवल कागजी फाइलों और वायरल तस्वीरों तक ही सीमित रहेगा। सेवा के मुखौटों को हटाकर, दर्द को महसूस करने वाले हाथों को सम्मान देने का वक्त आ चुका है।



