प्रकृति के संरक्षण में हो जनजाति की अटूट आस्था: मझगाँव में संपन्न हुआ पारंपरिक ‘बोंगा-बुरू’
मझगाँव (पश्चिम सिंहभूम):
‘हो’ जनजाति का जीवन दर्शन प्रकृति की गोद में पलता है। इसी आदिम परंपरा और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के उद्देश्य से मझगाँव प्रखंड के माँगापाट गाँव में ग्रामीणों ने अच्छी वर्षा और कृषि की समृद्धि के लिए पारंपरिक ‘बोंगा-बुरू’ (ग्राम देवता की पूजा) अनुष्ठान आयोजित किया। यह पूजा ‘हो’ समाज की उस गहरी आस्था को दर्शाती है जहाँ देवता ही प्रकृति के संचालक हैं।
हो संस्कृति की विशिष्ट पूजा पद्धति
इस अनुष्ठान में ‘हो’ समाज की अनूठी धार्मिक प्रक्रियाओं का पालन किया गया:
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- दियुरी की भूमिका: ‘हो’ समाज में दियुरी (ग्राम पुजारी) का स्थान सर्वोपरि है। दियुरी लालमोहन तिरिया के नेतृत्व में ग्राम देवता को प्रसन्न करने के लिए पवित्र बलि के रूप में लाल मुर्गे का उपयोग किया गया, जो शक्ति और शुद्धि का प्रतीक माना जाता है।
- पवित्र जल अर्पण (जंताल): अनुष्ठान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष मधुसुधन तिरिया द्वारा किया गया कृत्य था। उन्होंने उपवास रखकर दियुरी स्नान स्थल से जल उठाया। ‘हो’ परंपरा के अनुसार, पूरी शुद्धता के साथ अतिरिक्त नए हंडी (पात्र) का उपयोग कर जंताल पूजा स्थल पर जल अर्पित किया गया। यह जल अनुष्ठान वर्षा के देवता को आमंत्रित करने की एक जीवंत लोक-पद्धति है।
- प्रकृति से गहरा जुड़ाव: ‘हो’ समाज के बुजुर्गों का मानना है कि बोंगा-बुरू की तैयारी शुरू होते ही प्रकृति संकेत देती है। आकाश में बादलों का उमड़ना यह दर्शाता है कि ग्राम देवता समाज की प्रार्थना स्वीकार कर रहे हैं, जिससे खेती के लिए अनुकूल वातावरण तैयार होता है।
सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण
इस अवसर पर आदिवासी ‘हो’ समाज युवा महासभा के जिला कमिटी सदस्य सिकंदर तिरिया ने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा कि ‘बोंगा-बुरू’ केवल एक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों का दिया हुआ वह ज्ञान है जो हमें पर्यावरण से जोड़ता है। उन्होंने युवाओं से अपनी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने और समाज की इस गौरवशाली परंपरा की बागडोर संभालने का आग्रह किया।
इस आयोजन में सनातन तिरिया, गणेश तिरिया, रूपसिंह तिरिया, सागर बोदरा, बनमाली तिरिया, दशरथ तिरिया, राजकिशोर तिरिया सहित गाँव के अनेक ग्रामीण उपस्थित थे। यह अनुष्ठान न केवल माँगापाट के किसानों के लिए सुखद वर्षा का संकेत है, बल्कि ‘हो’ जनजाति की प्रकृति-केंद्रित जीवनशैली को भी मजबूती प्रदान करता है।



प्रकृति के संरक्षण में हो जनजाति की अटूट आस्था: मझगाँव में संपन्न हुआ पारंपरिक ‘बोंगा-बुरू’
