बेनीसागर: 1400 वर्ष पुराना शिव धाम, लेकिन विकास की राह अब भी अधूरी
अरबों की खुदाई, 206 शिवलिंग और ऐतिहासिक नगर के प्रमाण… फिर भी बेनीसागर क्यों उपेक्षित?
पश्चिमी सिंहभूम:
झारखंड की धरती अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत के लिए जानी जाती है। इन्हीं धरोहरों में एक है पश्चिमी सिंहभूम जिले का ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल बेनीसागर, जिसे सातवीं शताब्दी का लगभग 1400 वर्ष पुराना शिव धाम माना जाता है। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा वर्षों से यहां खुदाई का कार्य कराया जा रहा है और इस खुदाई में एक बड़े प्राचीन नगर के अस्तित्व के प्रमाण भी मिले हैं।
सबसे खास बात यह है कि मंदिरों के इस ऐतिहासिक परिसर से अब तक 206 शिवलिंग प्राप्त हुए हैं, जो भारतीय पुरातत्व विभाग की खुदाई के इतिहास में एक उल्लेखनीय उपलब्धि मानी जाती है। कई शिवलिंगों को संरक्षित कर स्थल के पास बने संग्रहालय में रखा गया है, जबकि कुछ आज भी वहीं स्थापित हैं।
लेकिन सवाल यह उठता है कि अरबों रुपये खर्च होने और ऐतिहासिक महत्व उजागर होने के बावजूद आखिर बेनीसागर आज भी उपेक्षा का शिकार क्यों है?
15 साल पहले जैसी ही स्थिति
स्थानीय लोगों की मानें तो वर्षों पहले जैसी स्थिति थी, आज भी तस्वीर लगभग वैसी ही बनी हुई है। खुदाई और शोध कार्य तो हुए, लेकिन पर्यटन, आधारभूत सुविधाओं और धार्मिक विकास के स्तर पर कोई बड़ा परिवर्तन देखने को नहीं मिला।
सावन के महीने में आसपास के ग्रामीण और श्रद्धालु अपने स्तर पर यहां पूजा-अर्चना करते हैं और शिव धाम की परंपरा को जीवित रखे हुए हैं। मगर इतने महत्वपूर्ण ऐतिहासिक स्थल को अब तक राष्ट्रीय स्तर की पहचान और सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं।
राजनीति में मंदिर, लेकिन बेनीसागर पर खामोशी
देश में मंदिर और सांस्कृतिक विरासत अक्सर राजनीतिक विमर्श का बड़ा विषय बनते हैं। कई राजनीतिक दल धार्मिक स्थलों के संरक्षण और विकास को लेकर बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन झारखंड राज्य गठन के 25 वर्ष बाद भी बेनीसागर जैसे ऐतिहासिक शिव धाम के विकास को लेकर ठोस पहल नजर नहीं आती।
यह सवाल भी उठ रहा है कि जब इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम बहुल देश में भी भगवान विष्णु मंदिर और रामलीला जैसी भारतीय परंपराओं को संरक्षित रखा जा सकता है, तो फिर झारखंड की अपनी ऐतिहासिक धरोहरों को वह पहचान और संरक्षण क्यों नहीं मिल पा रहा जिसकी वे हकदार हैं?
धार्मिक पर्यटन केंद्र बनने की क्षमता
बेनीसागर केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। यदि राज्य सरकार और पर्यटन विभाग गंभीर पहल करें, तो इसे धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है।
सड़क, प्रकाश व्यवस्था, ठहरने की सुविधा, मंदिर परिसर का सौंदर्यीकरण और नियमित धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन यहां पर्यटन को नई पहचान दे सकते हैं। इससे स्थानीय रोजगार और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।
विरासत बचाने की जरूरत
इतिहास केवल किताबों में नहीं, बल्कि ऐसे स्थलों में जीवित रहता है। बेनीसागर झारखंड की उस ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा है जिसे संरक्षित करना आने वाली पीढ़ियों के लिए जरूरी है। अब जरूरत इस बात की है कि सरकार, प्रशासन और समाज मिलकर इस धरोहर को केवल खुदाई तक सीमित न रखें, बल्कि इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाएं।
— The वॉयस खास | अबुआ अखाड़ा
लेखक: जितेंद्र ज्योतिषी



