प्रेस की घेराबंदी: सूचना के अधिकार और लोकतंत्र पर गहरा आघात

प्रेस की घेराबंदी: सूचना के अधिकार और लोकतंत्र पर गहरा आघात 

आगामी 24 जुलाई को विश्व के शक्तिशाली राष्ट्र के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पत्रकारों के साथ डिनर करेंगे मतलब अमेरिका मे पत्रकारिता की यह प्रतिष्ठा है पर हमारे यहाँ आज भी ब्रिटिश हुकूमत की याद दिलाता सिस्टम ज़ारी है!पत्रकारों को प्रशासन महत्वपूर्ण आयोजनों मे एक कोस दूर ही रखता है ​डिनर पार्टी दूर की बात है..प्रेस वार्ताओ मे प्रेस को नाश्ते का डब्बा दिया जाता है उसे भी मुख्य कुर्सी धारी व्यक्ति साथ बैठ कर खाने मे अपनी तौहीन समझता है* खैर अब हम आते है मुल विषय पर झारखंड में हाल के दिनों में मीडिया और सत्ता-प्रशासन के बीच बढ़ती दूरी बेहद चिंताजनक मोड़ पर पहुंच गई है। रिम्स जैसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान में पत्रकारों के प्रवेश पर रोक, चाईबासा में ‘दिशा’ की महत्वपूर्ण बैठक से मीडिया को दूर रखना, और सरकारी विभागों में बिना लिखित आदेश के सूचनाएं साझा करने पर लगा अघोषित प्रतिबंध—ये तमाम घटनाएं इस बात का स्पष्ट संकेत हैं! *कि राज्य में चौथे स्तंभ की स्वतंत्रता को सीमित करने का एक सुनियोजित प्रयास चल रहा है,
​अधिकारी और राजनेता डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर स्वयं तस्वीरें साझा कर, खुद ही सवाल और खुद ही जवाब की एक नई ‘एकतरफा संवाद’ संस्कृति को बढ़ावा दे रहे हैं।सवाल यह उठता है कि जिस प्रेस का काम जनता की तरफ से तीखे सवाल पूछना और व्यवस्था में पारदर्शिता लाना है, उसे सिर्फ सरकारी प्रचार की सामग्री क्यों समझा जा रहा है?
​इस पूरे घटनाक्रम का सबसे तकनीकी और गंभीर पहलू शासन-प्रशासन में आउटसोर्स की गई पीआर (PR) एजेंसियों की दखलअंदाजी है…यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस निजी एजेंसी का अनुबंध गत मार्च महीने में ही समाप्त हो चुका है,* उसके जरिए आखिर किस हैसियत से सरकारी तंत्र को संचालित और मीडिया को नियंत्रित किया जा रहा है?
​एक तरफ जनप्रतिनिधि स्थानीयता और रोजगार की बात करते है,वहीं दूसरी तरफ मास कम्युनिकेशन (जनसंचार) की पढ़ाई पूरी कर चुके झारखंड के स्थानीय युवाओं को मौका देने के बजाय,मियाद खत्म हो चुकी बाहरी एजेंसियों पर मेहरबानी दिखाई जा रही है।
​जब प्रेस को रोका जाता है, तो नुकसान सिर्फ पत्रकारों का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर आम जनमानस का होता प्रेस वार्ताएं यदि डेटा-विहीन और सिर्फ औपचारिकता (खानापूर्ति) के लिए होंगी, तो जनता तक योजनाओं और कमियों की सही रिपोर्ट कभी नहीं पहुंच पाएगी।
पीआर एजेंसियां केवल वही दिखाएंगी जो सत्ता पक्ष दिखाना चाहता है। इससे भ्रष्टाचार, अस्पतालों की बदहाली और प्रशासनिक सुस्ती जैसी जमीनी हकीकतें दब जाएंगी
​प्रेस जनता की समस्याओं को सरकार तक पहुंचाने का जरिया है। इस पर प्रतिबंध लगने से आम नागरिक की आवाज उठाने वाला कोई नहीं बचेगा..​प्रेस से दूरी और उसके अधिकारों का अतिक्रमण लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। यह झारखंड के प्रशासनिक इतिहास के सबसे निराशाजनक अध्यायों में से एक है सरकार और प्रशासन को यह समझना होगा कि विज्ञापन और जनसंपर्क (PR) कभी भी निष्पक्ष पत्रकारिता का विकल्प नहीं हो सकते। *यदि व्यवस्था में पारदर्शिता रखनी है, तो प्रेस पर लगाए गए इन अघोषित प्रतिबंधों को तुरंत हटाना होगा

The वॉयस खास
अबुआ अखाडा
के लिए
Jitendra jyotishi

The Voice Live 24x7

The Voice Live 24x7 संपादक प्रोफाइल जीतेन्द्र ज्योतिषी वर्तमान में the voice के प्रधान सम्पादक के साथ 'झारखंड जर्नलिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन'के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं..