The वॉयस खास: आर्थिक मितव्ययिता के दावों के बीच सरकारी फिजूलखर्ची का यह कैसा ‘डबल रोल’?
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- विशेष श्रृंखला: अबुआ अखाड़ा
- लेखक: जितेंद्र ज्योतिषी (Jitendra Jyotishi)
रांची/चाईबासा: एक तरफ देश और दुनिया के आर्थिक मंचों पर मंदी की आहट है, वित्तीय संतुलन बनाए रखने की चिंताएं हैं और खुद प्रधानमंत्री द्वारा सरकारी खर्चों में कटौती (कॉस्ट कटिंग) की वकालत की जा रही है; वहीं दूसरी तरफ धरातल पर कुछ ऐसे विरोधाभास दिख रहे हैं जो आम जनता की समझ से परे हैं। झारखंड समेत देश के कई राज्यों में इन दिनों एक ही काम के लिए जनता की गाढ़ी कमाई का ‘डबल खर्च’ किया जा रहा है।
सवाल यह है कि जब देश में आर्थिक अनुशासन की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब यह दोहरा आर्थिक बोझ किसके फायदे के लिए उठाया जा रहा है?
एक काम, दो दावेदार: भारी-भरकम सैलरी के बाद आउटसोर्सिंग का खेल
पूरा मामला सीधे तौर पर शासनिक-प्रशासनिक मिसमैनेजमेंट और अनावश्यक खर्चों से जुड़ा है। हर विभाग में जिला स्तर पर बकायदा लोक सेवक, अधिकारी और विशेषज्ञ पदाधिकारी तैनात हैं, जिन्हें हर महीने लाखों रुपये की सरकारी सैलरी और सुविधाएं दी जाती हैं। विभाग के कार्यों को निष्पादित करना इन्हीं सेवा वर्ग के अधिकारियों की जिम्मेदारी है।
विडंबना देखिए… जिस काम के लिए एक परमानेंट सरकारी अधिकारी पहले से मौजूद है, उसी काम को करने के लिए राज्य के बाहर की निजी आउटसोर्सिंग एजेंसियों को करोड़ों के ठेके दे दिए जा रहे हैं।
यह एजेंसियां फिर से उन्हीं कामों के लिए निजी लोगों को 35 से 40 हजार रुपये की सैलरी पर बहाल करती हैं। यानी पर्दे के पीछे से एक समानांतर व्यवस्था खड़ी कर दी गई है। नतीजा? सरकारी खजाने पर सीधे तौर पर दोहरा बोझ।
हद पार: ‘टेंडर के अंदर टेंडर’ का खेल
हद तो तब हो जाती है जब इस भारी-भरकम आउटसोर्सिंग के बावजूद, ‘डेवलपमेंट’ के नाम पर उसी काम से जुड़े छोटे-छोटे हिस्सों (जैसे कैमरा फोटोग्राफी, कंप्यूटर ऑपरेटिंग आदि) के लिए स्थानीय स्तर पर अलग से टेंडर जारी कर दिए जाते हैं। यानी एक ही चेन में कई स्तरों पर भुगतान हो रहा है और जनता का पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है।
स्थानीय युवाओं की अनदेखी, बाहरी कंपनियों की चांदी
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे दुखद पहलू रोजगार का गणित है। इन आउटसोर्सिंग टेंडरों के जरिए राज्यों से बाहर की बड़ी निजी कंपनियों की जेबें तो भरी जा रही हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर रोजगार की समस्या जस की तस बनी हुई है!
अपने राज्य में भी उच्च शिक्षा-दीक्षा प्राप्त, तकनीकी रूप से कुशल और योग्य बेरोजगार युवक-युवतियों की कोई कमी नहीं है। हम झारखंड जैसे प्रदेश को देखें, अगर पूर्ववर्ती सरकार को अतिरिक्त जनशक्ति की जरूरत थी भी, तो इन स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई?
- राज्य का पैसा राज्य में रहता: बाहरी एजेंसियों को करोड़ों का टर्नओवर देने के बजाय, यदि स्थानीय प्रतिभाओं को सीधे मौका दिया जाता, तो राज्य का पैसा राज्य के भीतर ही रोटेट होता और स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत होती।
- स्वावलंबन: शिक्षित बेरोजगार युवाओं को उनके अपने गृह राज्य में सम्मानजनक आजीविका मिलती।
- भ्रष्टाचार पर लगाम: बिचौलियों और बाहरी कंपनियों को दिए जाने वाले मोटे कमीशन और अनावश्यक खर्चों पर पूरी तरह लगाम लगती।
आरामपसंद अधिकारी और व्यवस्था पर बढ़ता बोझ
पर ऐसा हुआ नहीं, एक नई परंपरा प्रारंभ कर दी गई। इस परंपरा ने जहां इस व्यवस्था से जुड़े अधिकारी-पदाधिकारियों को आरामपसंद बना दिया—जो फील्ड में अपनी जगह आउटसोर्स के लोगों का इस्तेमाल करते हैं—वहीं राज्य पर अनावश्यक आर्थिक बोझ भी बढ़ा दिया।
‘अबुआ अखाड़ा’ का सीधा आग्रह: सुधार के लिए 3 बड़े सुझाव
‘The वॉयस’ के इस विशेष मंच ‘अबुआ अखाड़ा’ में यह लेख किसी व्यवस्था का विरोध नहीं, बल्कि आर्थिक बुद्धिमत्ता का एक सीधा आग्रह है:
- समीक्षा हो: सरकार को तात्कालिक रूप से इस ‘डबल-ट्रिपल खर्च’ मॉडल की समीक्षा करनी चाहिए।
- जवाबदेही तय हो: यदि जिला स्तर के अधिकारी सक्षम हैं, तो आउटसोर्सिंग की निर्भरता को तुरंत कम किया जाए और अधिकारियों को काम पर लगाया जाए।
- ‘वोकल फॉर लोकल’ सच हो: जहाँ मैनपावर की वाकई कमी है, वहाँ बाहरी कंपनियों के बजाय सीधे स्थानीय शिक्षित बेरोजगारों को मौका देकर ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘स्थानीय रोजगार’ के संकल्प को सच साबित किया जाए।
आखिरी बात: आर्थिक तूफान की आशंकाओं के बीच, बजट का सही प्रबंधन ही सच्ची बुद्धिमत्ता है, क्योंकि आने वाला समय बहुत अच्छा नहीं है।
जनता को पैसे बचाने और किफायती बनने का सुझाव देना अच्छा है, पर सरकारों को भी किफायती बनाना सरकार के चर्चित मुखियाओं का परम कर्तव्य है।
The वॉयस खास
अबुआ अखाड़ा के लिए
– जितेंद्र ज्योतिषी (Jitendra Jyotishi)
आर्थिक मितव्ययिता के दावों के बीच सरकारी फिजूलखर्ची का यह कैसा ‘डबल रोल’?



जनता को पैसे बचाने और किफायती बनने का सुझाव देना अच्छा है, पर सरकारों को भी किफायती बनाना सरकार के चर्चित मुखियाओं का परम कर्तव्य है।