वीआईपी संस्कृति के बीच सादगी की अनकही दास्तान

पर्यावरण दिवस पर याद आए ‘धरती पुत्र’: वीआईपी संस्कृति के बीच सादगी की अनकही दास्तान

– जितेंद्र ज्योतिषी

​आज विश्व पर्यावरण दिवस की सुबह खुशनुमा थी, लेकिन दिन चढ़ने के साथ ही धूप की तपिश और भीषण गर्मी ने बेहाल कर दिया। इस खास दिन पर एक सहज ख्याल आया कि शायद आज सड़कों पर गाड़ियाँ कम होंगी और पेट्रोल पंपों पर भीड़ नहीं दिखेगी। मगर, हकीकत इस सोच के ठीक उलट थी। सड़कों पर गाड़ियों का रेला था और अलर्ट सायरन बजाती ७-८ गाड़ियों का वीआईपी काफिला शहर की सड़कों की ‘शोभा’ बढ़ा रहा था।

​पल भर के लिए भ्रम हुआ कि शायद मुख्यमंत्री जी औचक निरीक्षण या पौधरोपण के लिए आए हैं। पूछने पर पता चला कि मुख्यमंत्री और मंत्री दीपक बिरुआ रांची में राज्यसभा चुनाव की महत्वपूर्ण बैठक में हैं। खैर, जुगाड़ तंत्र शाम तक बता ही देगा कि चाईबासा से कौन से बड़े राजनेता गुजरे। भारी-भरकम गाड़ियों, उड़ती धूल और हीटवेव के बीच जब पर्यावरण दिवस की जमीनी हकीकत को समझने का सफर शुरू हुआ, तो जेहन में भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के उन अधिकारियों की भूली दास्तानें ताजा हो गईं, जिन्होंने इस जिले में पर्यावरण संरक्षण को स्थायी पहचान दी थी।

​९० का दशक: सादगी और सारंडा की पदयात्रा

​याद आते हैं ९० के दशक में संयुक्त सिंहभूम के डीसी रहे सुभाष शर्मा। सादगी के प्रतिमान ऐसे कि खुद साइकिल या पैदल सब्जी खरीदने बाजार जाते थे। बच्चों को स्कूल भेजने के लिए कभी सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल नहीं किया, उनकी पत्नी रिक्शे से बच्चों को स्कूल छोड़ती थीं। यह वही सुभाष शर्मा थे जिन्होंने सारंडा के वनों को बचाने के लिए ऐतिहासिक संपूर्ण सारंडा पदयात्रा की और नारा दिया—“वृक्ष बचाओ, वन बचाओ, करो संकल्प महान।”

​इसके बाद आए स्व. सजल चक्रवर्ती। उन्होंने चाईबासा के लकड़ी बाजार में तब्दील हो चुके ‘मंगल बाजार’ को लकड़ी माफियाओं के चंगुल से मुक्त कराया। वहीं, सादगी पसंद और प्रेस-फ्रेंडली डीसी अमित खरे (जिन्होंने पशुपालन घोटाले को उजागर किया) ने अपनी पत्नी निधि खरे के साथ मिलकर संयुक्त सिंहभूम में ‘वन बचाओ अभियान’ चलाया और डायन प्रथा उन्मूलन के लिए पदयात्रा की।

​दुर्गम क्षेत्रों में संवाद और जल संरक्षण का दौर

​बाद के कालखंड में उपायुक्त उदय प्रताप सिंह और तत्कालीन प्रशिक्षु आईएएस आरती ऋषि ने सारंडा की सुरक्षा के लिए अनुकरणीय कार्य किया। वे बिना किसी सरकारी तामझाम के सारंडा के ‘थोलकोबाद’ जैसे बेहद बीहड़ और सुदूरवर्ती इलाके में पैदल पहुंचे, पेड़ों के नीचे बैठकर ग्रामीणों से संवाद किया और उनसे पेड़ न काटने की भावुक अपील की।

​साल २००० का दशक आते-आते जल, वन और सिंचाई संसाधनों को दुरुस्त करने का बीड़ा उठाया तत्कालीन उप विकास आयुक्त (DDC) अविनाश कुमार ने, जो आज झारखंड के मुख्य सचिव हैं। उस दौर में, अविनाश कुमार ने मेरे द्वारा बनाई जा रही वृत्तचित्र (Documentary) ‘सिंहभूम का सच’ के लिए एक दीर्घकालिक सुझाव दिया था कि हमें भविष्य में जलवायु परिवर्तन और कृषि जल की कमी को देखते हुए जल संसाधन विकास की सफल योजनाओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

​राज्य गठन के बाद, उपायुक्त के रूप में राजीव अरुण एक्का ने धरातल पर जल और पेड़ पौधों के संरक्षण के लिए जो कार्य किए, वे आने वाली पीढ़ी के लिए शोध का विषय हैं।

​कड़े फैसले, संवेदनशीलता और राष्ट्रीय पहचान

​झारखंड में संभवतः पहली बार खनिज संपदा (लोहा, पत्थर आदि) की ढुलाई करने वाले वाहनों को तिरपाल से ढक कर ले जाने की सख्त परंपरा की शुरुआत तत्कालीन उपायुक्त और वर्तमान वन सचिव अब्बू बकर सिद्दीक पी. ने की थी, ताकि आम जनता को उड़ते लौह-धूलकणों से बचाया जा सके। उनकी सादगी का आलम यह था कि हर शुक्रवार को जब वे मस्जिद में नमाज पढ़ने आते, तो खुद खड़े होकर अपनी गाड़ी किनारे पार्क करवाते थे ताकि डीसी की गाड़ी की वजह से आम जनता को कोई असुविधा न हो।

​अब्बू बकर सिद्दीक पी. के बाद उपायुक्त रहे अरवा राजकमल (वर्तमान में मुख्यमंत्री के सचिव) ने डीएफओ रजनीश कुमार के साथ मिलकर पर्यावरण जागरूकता के लिए कई अहम कार्य किए। उनके द्वारा जल संरक्षण पर बनाई गई लघु फिल्म ‘घड़ी’ को देशव्यापी सराहना मिली। इसी कालखंड में कमिश्नर के रूप में विजय कुमार आए, जिन्होंने कोल्हान में १ लाख पौधे लगाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।

​…और आज का कड़वा सच

​यह सिंहभूम का दुर्भाग्य ही है कि बदले हुए दौर में, ‘विकास की अंधी दौड़’ के आगे दूरगामी और स्थायी पर्यावरण संरक्षण की नीतियां दम तोड़ रही हैं। आज जनहित के सुझावों और व्यवस्था के बीच ‘इगो’ (अहंकार) की एक ऐसी मजबूत दीवार खड़ी हो गई है, जिसके कारण न इस पार का सच दिखाई देता है, न उस पार का। वीआईपी सायरनों के शोर के बीच पर्यावरण दिवस की मूल आत्मा कहीं खो गई है।

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The Voice Live 24x7 संपादक प्रोफाइल जीतेन्द्र ज्योतिषी वर्तमान में the voice के प्रधान सम्पादक के साथ 'झारखंड जर्नलिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन'के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं..