विशेष रिपोर्ट
: विकास की ‘100 की स्पीड’ में छूटता कला का साथ, सिंहभूम में घुट रहा हुनर का दम
चाईबासा।
एक तरफ विकास कार्य 100 की स्पीड से दौड़ रहे हैं। जनता के काम के लिए अधिकारी दफ्तरों से ज्यादा फील्ड में नजर आ रहे हैं, लेकिन इसी तेज रफ्तार विकास के शोर में सूचना के अभाव से जूझते ग्रामीण आज भी उम्मीद लेकर दूर दराज से मुख्यालय आते हैं और खाली हाथ लौट जाते हैं। विकास की इस 100 स्पीड वाली दौड़ में आम आदमी की मजबूरी कहीं हवा हो रही है। यह विडंबना तो जननायकों को इसकी आवाज़ उठानी चाहिए थी, लेकिन जब ‘नेता जी’ मौन हों, तो सवाल उठता है कि आखिर इस अनदेखी का दोषी कौन है? बहरहाल हम बात करे सिंहभूम की कला जगत की
उर्दू लाइब्रेरी में दिखा हुनर, मिस कशिश का प्रयास
कलाकारों और स्थानीय संस्थाओं का निजी प्रयास ही अब यहाँ कला को जीवित रखने का एकमात्र सहारा बना हुआ है। ऐसा ही एक खूबसूरत नजारा गत रविवार को चाईबासा उर्दू लाइब्रेरी में देखने को मिला, जहाँ आयोजित एक दिवसीय ‘मेहंदी प्रतियोगिता’ बड़े ही उत्साह, मसर्रत और हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुई।
सुश्री कशिश के इस आयोजन मे सैकड़ों प्रतिभावान युवतियों ने शिरकत की। युवतियों ने अपनी उंगलियों के जादू से रचनात्मकता और कला का ऐसा मंजर पेश किया कि देखने वाले कायल हो गए। इस कार्यक्रम की महत्ता को देखते हुए सरकारी महकमे के दो अधिकारी भी यहाँ पहुंचे। हालांकि, इस तरह के हुनरमंदों को आगे बढ़ाने के लिए संबंधित विभाग की ओर से जिस व्यवस्थित प्रोत्साहन और दीर्घकालिक सहयोग की जरूरत है, वह अब भी धरातल पर नदारद है।
व्यवसायीकरण की भेंट चढ़ा रंगमंच और साहित्य
हाल ही में क्षेत्र के बुद्धिजीवियों ने सिंहभूम की कला स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि हर कला का एक दौर होता है, लेकिन सिंहभूम में रंगमंच, साहित्य और फिल्म जगत को संबंधित विभागों द्वारा महज ‘व्यवसायीकरण’ तक सीमित कर दिया गया। नतीजा यह हुआ कि आज धरातल पर इन विधाओं का कोई नामलेवा नहीं बचा है। सरकारी स्तर पर नीतिगत प्रोत्साहन न मिलने के कारण आज सिंहभूम के कलाकार अपने-अपने स्तर पर कला को जीवित रखने के लिए संघर्ष करने को मजबूर हैं।
गले में फंसी मछली की तरह तड़प रही है कला
यह मेहंदी प्रतियोगिता तो एक बानगी मात्र है, जो निजी स्तर पर आयोजित की गई। सिंहभूम की धरा पर ऐसी न जाने कितनी लोक कलाएं और विधाएं हैं, जो प्रोत्साहन के अभाव में या तो दम तोड़ चुकी हैं या अंतिम सांसें गिन रही हैं। स्थिति यह हो गई है कि मरती हुई कला को बचाने के लिए या ‘गले में फंसी मछली’ की तरह इस संकट को बाहर निकालने वाला कोई ‘डॉक्टर’ (मसीहा) नजर नहीं आ रहा है।
विकास की रफ्तार 100 की स्पीड से चल रही है, यह सुखद है। लेकिन कला और संस्कृति के बिना कोई भी समाज अंदर से समृद्ध नहीं हो सकता। सिंहभूम की जनता और यहाँ के कलाकारों को अब भी यह उम्मीद है कि विकास का यह तेज रफ्तार रथ किसी दिन कला के पड़ाव पर भी पूरी संवेदनशीलता के साथ रुकेगा, और यहाँ के दम तोड़ते हुनर को नया जीवन मिलेगा।



