सारंडा का संकट: जलवायु परिवर्तन के युग में नियामकीय विफलता की कीमत
विश्व पर्यावरण दिवस विशेष
झारखंड का सारंडा वन केवल लौह अयस्क का भंडार नहीं है, बल्कि एशिया के सबसे बड़े साल वनों में से एक, एक महत्वपूर्ण कार्बन सिंक, हाथियों का प्राकृतिक आवास और पूर्वी भारत की जल सुरक्षा का आधार है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस वन क्षेत्र को जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध प्राकृतिक कवच होना चाहिए था, वह आज नियामकीय विफलताओं, कानूनी अनिश्चितताओं और अनियंत्रित खनन के दबाव में लगातार कमजोर होता जा रहा है।
सारंडा का मामला केवल वन संरक्षण का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं और पर्यावरणीय शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता की भी परीक्षा है। 1968 में अधिसूचित “सारंडा गेम सेंचुरी” से जुड़े अभिलेखों का गायब हो जाना और उसके बाद दशकों तक वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत औपचारिक अधिसूचना की प्रक्रिया का लंबित रहना प्रशासनिक उदासीनता का ऐसा उदाहरण है, जिसकी कीमत पूरा पारिस्थितिकी तंत्र चुका रहा है।
वर्ष 2014 में शाह आयोग ने सारंडा क्षेत्र में अवैध खनन, पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन और व्यापक पारिस्थितिकीय क्षति की ओर संकेत किया था। इसके बाद ICFRE द्वारा तैयार वहन क्षमता (Carrying Capacity) अध्ययन ने स्पष्ट किया कि इस क्षेत्र की पर्यावरणीय सीमाएं हैं और अनियंत्रित खनन दीर्घकालिक रूप से विनाशकारी सिद्ध होगा। बावजूद इसके, प्रबंधन योजना के प्रभावी क्रियान्वयन में दिखाई गई सुस्ती यह दर्शाती है कि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति अब भी कमजोर है।
आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों से जूझ रही है, तब सारंडा का महत्व और बढ़ जाता है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार घने वन वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वैश्विक तापवृद्धि को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सारंडा जैसे वन क्षेत्र स्थानीय स्तर पर वर्षा चक्र को स्थिर रखते हैं, भूजल पुनर्भरण को बढ़ाते हैं तथा तापमान नियंत्रण में योगदान देते हैं।
खनन गतिविधियों के कारण बड़े पैमाने पर वन कटाई से कार्बन भंडारण क्षमता घटती है। इसके साथ ही मिट्टी का क्षरण बढ़ता है, जल स्रोत सूखने लगते हैं और जैव विविधता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। परिणामस्वरूप क्षेत्रीय स्तर पर हीट वेव, अनियमित वर्षा, सूखे और अचानक बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है। कोल्हान और दक्षिणी झारखंड में हाल के वर्षों में देखी जा रही असामान्य मौसमी परिस्थितियों को इस व्यापक पारिस्थितिकीय क्षरण से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा सारंडा को औपचारिक वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित करने पर विचार करने का निर्देश वस्तुतः अंतिम चेतावनी है। यदि अब भी संरक्षण संबंधी निर्णयों में देरी होती है तो इसका प्रभाव केवल वन्यजीवों या स्थानीय समुदायों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह क्षेत्रीय जलवायु स्थिरता, जल सुरक्षा और भविष्य की पीढ़ियों के जीवन पर भी पड़ेगा।
विश्व पर्यावरण दिवस केवल पौधारोपण के प्रतीकात्मक कार्यक्रमों का दिन नहीं है। यह उन नीतिगत और प्रशासनिक कमियों पर आत्ममंथन का अवसर भी है, जो पर्यावरणीय संकटों को जन्म देती हैं।
सारंडा का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि क्या सरकारें, नियामक संस्थाएं और उद्योग अल्पकालिक आर्थिक लाभ से ऊपर उठकर पारिस्थितिकीय सुरक्षा को प्राथमिकता देने का साहस दिखाते हैं।
क्योंकि यदि सारंडा हारता है, तो केवल एक जंगल नहीं हारता—जलवायु परिवर्तन के खिलाफ हमारी सामूहिक लड़ाई भी कमजोर पड़ती है।



