“साहब! वो सरहद नहीं, हमारी ज़िन्दगी थी”
खामोश चिमनियां, जंग खाते विशाल लोहे के ढांचे और पसरा हुआ सन्नाटा… यह आज झींकपानी स्थित ऐतिहासिक ‘चाईबासा सीमेंट वर्क्स’ की तस्वीर है। लेकिन इस खामोशी के पीछे हज़ारों परिवारों की चीखें दफन हैं, जो अब एक दर्द भरी चिट्ठी के ज़रिए देश के प्रधान सेवक माननीय प्रधानमंत्री तक पहुंची हैं।
यह चिट्ठी किसी नेता या यूनियन की नहीं, बल्कि एक ऐसे कर्मचारी की पत्नी की है, जिसने अपने जीवन के सुनहरे 38 साल इस फैक्टरी की सेवा में लगा दिए। वाराणसी में बसी श्रीमती किरण सिंह, पत्नी सुरेंद्र सिंह (सेवानिवृत्त जीएम एचआर), की यह कांपते हाथों से लिखी गई ‘आपातकालीन अपील’ महज़ एक कागज़ का टुकड़ा नहीं, बल्कि खनन प्रभावित क्षेत्र की बेबस जनता का रुदन है।
38 साल का रिश्ता, एक झटके में बेगाना
चिट्ठी के शब्द-शब्द से दर्द रिस रहा है। किरण सिंह लिखती हैं, “मेरे पति ने अपने जीवन के 38 साल, अपनी जवानी, पसीना और अटूट वफादारी इस फैक्टरी को दी। उस फैक्टरी की आवाज़ हमारे पूरे जीवन का पार्श्व संगीत थी; इसने हमारे बच्चों को पाला और हमारे घर को संभाला।”
वह आगे एक मार्मिक सवाल पूछती हैं, जिसने व्यवस्था की संवेदनशीलता को झकझोर कर रख दिया है: “उसे आज खामोश खड़ा देखना मेरा दिल तोड़ देता है… मैं अब अपने जीवन की शाम में हूँ, और मेरी इकलौती हार्दिक प्रार्थना यही है कि उन फाटकों पर जीवन, गरिमा और रोजगार लौट आए, इससे पहले कि हमारी पीढ़ी गुज़र जाए।”
सिर्फ़ काम की जगह नहीं, इलाक़े की जीवनरेखा
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फैक्टरी सिर्फ़ सीमेंट नहीं बनाती थी, बल्कि पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था, आदिवासी समुदायों और हज़ारों परिवारों की जीवनरेखा थी। 2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अर्जुन मुंडा द्वारा उद्घाटन किए गए विस्तार के बाद, यहाँ 2000 कर्मचारी सीधे तौर पर काम करते थे। यहाँ 900 क्वार्टर वाली एक पूरी कॉलोनी थी, जो एक आत्मनिर्भर पारिस्थितिकी तंत्र था।
लेकिन आज, लीज़ नवीनीकरण की प्रशासनिक और कानूनी बाधाओं ने इस हंसते-खेलते संकुल को उजाड़ दिया है। चिट्ठी में प्रधान मंत्री से हस्तक्षेप की गुहार लगाई गई है, क्योंकि यह बंदी हज़ारों आदिवासी और स्थानीय परिवारों को गंभीर वित्तीय संकट में धकेल रही है।
प्रशासनिक पेच या “आत्मनिर्भर भारत” का अंत?
किरण सिंह ने अपनी अपील में एक बड़ा सवाल उठाया है। वह लिखती हैं कि एक तरफ सरकार ‘आत्मनिर्भर भारत’ का सपना देखती है, दूसरी तरफ एक स्थापित, संसाधन-संपन्न उद्योग को बंद होने दिया जा रहा है। उन्होंने प्रधान मंत्री से मंत्रालयों और हितधारकों के बीच बातचीत शुरू कराकर मुद्दों को हल करने और “फैक्टरी में फिर से जान फूंकने” की याचना की है।
यह चिट्ठी महज़ एक गुहार नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि अगर झींकपानी की यह जीवनरेखा पुनर्जीवित नहीं हुई, तो यहाँ के हज़ारों परिवारों का भविष्य हमेशा के लिए अँधेरे में डूब जाएगा। क्या सत्ता के गलियारों में इस दर्द भरी चिट्ठी की गूंज सुनाई देगी? क्या झींकपानी की खामोश चिमनियों से फिर धुआं उठेगा? यह सवाल आज हर प्रभावित परिवार की आँखों में तैर रहा है।




