आस्था के रथ पर लापरवाही का ‘ब्रेक’
चाईबासा: धर्म और आस्था के उत्सवों में स्थानीय प्रशासनिक समन्वय और पूर्व-तैयारी की भूमिका सर्वोपरि होती है। लेकिन चाईबासा के बड़ा नीमडीह स्थित मूंधड़ा गली में जो हुआ, वह केवल एक तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र की विफलता है जिसे शांति समिति की बैठकों में बड़ी-बड़ी बातें करने की आदत है। भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के दौरान रथ का पहिया टूटना और प्रभु के विग्रहों को उतारकर ले जाने की विवशता, यह दर्शाती है कि कागजों पर लिए गए निर्णयों का जमीन पर कोई अस्तित्व नहीं रहा।
शांति समिति की बैठक में मार्ग को बाधा मुक्त करने का निर्णय लिया गया था। ऊंचे बंफरो (तारों का जाल) और नीम की मोटी डालियों को हटाने की जिम्मेदारी प्रशासन के संबंधित विभागों की थी। यदि ये कार्य समय रहते पूर्ण किए गए होते, तो आज प्रभु को रथ से उतारने की ऐसी हृदयविदारक स्थिति उत्पन्न नहीं होती।
Post center
धार्मिक दृष्टिकोण से रथ यात्रा में आया यह व्यवधान भक्तों के मन में अनहोनी की गहरी आशंका पैदा कर गया है। लोगो मे यह चर्चा का विषय है, जिस नगर से राज्य के परिवहन मंत्री आते हो उस शहर मे महाप्रभु जग्गनाथ के रथ का पहिया टूट जाना निकट भविष्य मे राजनीतिक रूप सही नहीं माना जा रहा है चाईबासा की इस घटना को राज्य की राजनीति से जोड़ कर भी देखा जा रहा है! गौरतलब है कि 
चाईबासा के श्रद्धालु सदियों से अपनी अटूट आस्था के साथ रथ खींचते आए हैं, लेकिन आज वे व्यवस्था के प्रति गहरे आक्रोश में हैं। जब रथ यात्रा को लेकर होने वाली बैठक में स्पष्ट रूप से चर्चा हुई थी, व्यापक सुधार का निर्णय हुआ तो निर्णय का क्रियान्वयन सुनिश्चित क्यों नहीं हुआ? इससे जिम्मेदार लोग अपनी जवाबदेही से बच सकते हैं?
यह घटना एक आईना है उन लोगो के लिए जो उत्सवों की तैयारी को मात्र एक औपचारिकता मानते हैं। आस्था के महापर्व में आई यह बाधा न केवल एक बडी सरकारी गैर सरकारी प्रबधनीय चूक है, बल्कि आम जनमानस की भावनाओं के साथ खिलवाड़ भी है। वक्त आ गया है कि संबंधित विभाग अपनी कार्यशैली में सुधार लाए और धार्मिक आयोजनों को सुगम बनाने के लिए जमीनी स्तर पर जवाबदेही तय करे।



