कस्तूरबा विद्यालयों में कॉपी खरीद की उच्चस्तरीय जांच की मांग
देश से लेकर राज्य के प्रशासनिक गलियारों तक इस वक्त शिक्षा व्यवस्था सुर्खियों में है। एक तरफ जहां केंद्र की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नीत सरकार शिक्षा के मुद्दों और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे को लेकर विपक्ष के निशाने पर है, वहीं झारखंड के राजनीतिक पटल पर भाजपा ने राज्य सरकार को घेरने में पूरी ताकत झोंक दी है। ताजा मामला झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले से जुड़ा है, जहां डीएमएफटी (DMFT) फंड और शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पहले से ही चर्चा के केंद्र में रही है।
अब कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों और आवासीय विद्यालयों में कॉपियों की खरीद में कथित तौर पर बाजार दर से काफी अधिक कीमत पर आपूर्ति करने का गंभीर मामला सामने आया है।
इस संबंध में भाजपा पिछड़ा जाति मोर्चा झारखंड के प्रदेश मंत्री हेमन्त कुमार केशरी ने पश्चिमी सिंहभूम के उपायुक्त को एक औपचारिक पत्र सौंपकर पूरे मामले की सघन जांच और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
भ्रष्टाचार के पुराने पन्ने और बार-बार उठते सवाल
पश्चिमी सिंहभूम जिले में शिक्षा विभाग के आपूर्ति कार्यों में अनियमितता कोई नई बात नहीं है। ज्ञापन में जिन बिंदुओं को उठाया गया है, वे प्रशासनिक महकमे की कार्यशैली पर गहरे सवालिया निशान लगाते हैं:
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- अंडा आपूर्ति घोटाला: कुछ वर्ष पूर्व कस्तूरबा विद्यालयों में बाजार मूल्य से अत्यधिक दरों पर मुर्गा और अंडा आपूर्ति की शिकायत पर हुई जांच में सत्यता पाई गई थी, जिसके परिणामस्वरूप जिला शिक्षा पदाधिकारी पर निलंबन की गाज गिरी थी।
- पीएम श्री विद्यालय खरीद विवाद: गत वर्ष पीएम श्री विद्यालयों में लगभग 2 करोड़ रुपये की सामग्री आपूर्ति में बरती गई अनियमितता की शिकायत पर जांच तो हुई और सूत्रों के अनुसार गड़बड़ी प्रमाणित भी हुई, परंतु आरटीआई के तहत रिपोर्ट मांगने के बावजूद अब तक उसकी प्रतिलिपि उपलब्ध न कराया जाना विभागीय पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
- कस्तूरबा विद्यालयों में कॉपी खरीद की नई गूंज: वर्तमान में आवासीय और कस्तूरबा विद्यालयों में कॉपियों की खरीद में भारी वित्तीय अनियमितता और बाजार से कई गुना अधिक दामों पर आपूर्ति की चर्चा पूरे जिले में आम हो चुकी है।
सिंडिकेट और ‘टेबल निविदा’ की कुप्रथा
शिकायत पत्र में यह भी रेखांकित किया गया है कि शिक्षा विभाग में एक ही आपूर्तिकर्ता समूह वर्षों से अपनी गहरी पैठ बनाए हुए है। सुनियोजित तरीके से सरकारी राजस्व को नुकसान पहुँचाने के लिए शिक्षा विभाग के आला अधिकारियों की मिलीभगत से ‘टेबल निविदा’ (Table Tender) जैसी कुप्रथाओं का सहारा लिया जा रहा है, जिससे निष्पक्ष और पारदर्शी प्रतिस्पर्धा दम तोड़ रही है।
प्रशासनिक साख और जनता की उम्मीदें
एक तरफ जहां राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के इन मामलों को लेकर आक्रामक तेवर अपनाए हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ आम जनता की निगाहें जिला प्रशासन के मुखिया यानी उपायुक्त, पश्चिमी सिंहभूम पर टिकी हुई हैं। पूर्व में की गई त्वरित कार्रवाइयों के कारण जनता में प्रशासन के प्रति जो विश्वास जगा है, वह इस नई शिकायत पर भी एक कठोर और निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद करता है।
अब यह देखना बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण होगा कि जिला प्रशासन इस सनसनीखेज मामले में कितनी जल्दी संज्ञान लेता है, कॉपियों की खरीद में हुए खेल की तह तक पहुँचता है और वर्षों से जड़े जमाए बैठे उस कथित सिंडिकेट पर क्या शिकंजा कसता है। शिक्षा के मंदिरों को भ्रष्टाचार का अखाड़ा बनने से बचाने के लिए पारदर्शी और त्वरित प्रशासनिक हस्तक्षेप समय की सबसे बड़ी मांग है।



