ट्रैक्टरों की बढ़ती बिक्री: विकास का पहिया या कर्ज और घोटालों का चक्र?

झारखंड में भी ट्रैक्टरों की बिक्री लगातार बढ़ रही है। लेकिन क्या इसके साथ किसानों की आय भी उसी अनुपात में बढ़ी है?

जीतेन्द्र ज्योतिषी

Post center

IMG-20260701-WA0366
IMG-20260701-WA0366

झारखंड के गांवों में ट्रैक्टरों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। पहली नजर में यह कृषि आधुनिकीकरण और ग्रामीण विकास की तस्वीर लगती है। लेकिन इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक ऐसा सच भी छिपा है, जिस पर गंभीर बहस और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता है।
देश के कई राज्यों में समय-समय पर ट्रैक्टर खरीद, कृषि यंत्रीकरण योजनाओं और सब्सिडी वितरण में अनियमितताओं के आरोप सामने आते रहे हैं। कहीं फर्जी लाभार्थियों के नाम पर सब्सिडी ली गई, कहीं वास्तविक किसान तक योजना नहीं पहुंची, तो कहीं डीलर, बिचौलियों और वित्तीय संस्थानों की मिलीभगत के आरोप लगे। कई मामलों में जांच एजेंसियों ने कार्रवाई भी की। इन घटनाओं ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या कृषि यंत्रीकरण की योजनाओं का लाभ वास्तव में किसान को मिल रहा है, या व्यवस्था का एक हिस्सा इसे कमाई का माध्यम बना चुका है?
झारखंड में भी ट्रैक्टरों की बिक्री लगातार बढ़ रही है। लेकिन क्या इसके साथ किसानों की आय भी उसी अनुपात में बढ़ी है? यदि नहीं, तो बढ़ती बिक्री का लाभ आखिर किसे मिल रहा है?
आज अधिकांश छोटे और सीमांत किसान बैंक या फाइनेंस कंपनियों से ऋण लेकर ट्रैक्टर खरीद रहे हैं। शुरुआत में आसान किस्तों का सपना दिखाया जाता है, लेकिन जब खेती से अपेक्षित आमदनी नहीं होती, डीजल महंगा होता है, मौसम साथ नहीं देता और किराये का काम भी सीमित रह जाता है, तब यही ट्रैक्टर किसान के लिए कर्ज का बोझ बन जाता है।
दूसरी ओर ट्रैक्टर कंपनियां अपना बिक्री लक्ष्य पूरा करती हैं, डीलरों का कारोबार बढ़ता है, बैंक और फाइनेंस कंपनियां ब्याज कमाती हैं तथा बीमा कंपनियों का भी कारोबार बढ़ता है। सबसे अधिक जोखिम वही किसान उठाता है, जिसके नाम पर पूरी व्यवस्था खड़ी दिखाई देती है।
अब समय आ गया है कि सरकार केवल यह न बताए कि कितने ट्रैक्टर बिके, बल्कि यह भी सार्वजनिक करे कि उनमें से कितने ट्रैक्टर आज भी नियमित रूप से कृषि कार्य में उपयोग हो रहे हैं, कितने ऋण खाते बकाया या एनपीए की श्रेणी में पहुंच चुके हैं, कितने किसानों को सब्सिडी का वास्तविक लाभ मिला और कितने किसानों ने कर्ज के दबाव में अपनी संपत्ति बेचने या ट्रैक्टर वापस कराने जैसी नौबत का सामना किया।
झारखंड जैसे राज्य में, जहां अधिकांश किसानों के पास छोटी जोत और वर्षा आधारित खेती है, वहां कृषि यंत्रीकरण की सफलता केवल ट्रैक्टरों की बिक्री से नहीं मापी जा सकती। सफलता का पैमाना किसान की बढ़ती आय, कम होता कर्ज और टिकाऊ खेती होना चाहिए।
यदि ट्रैक्टर खेतों से अधिक बैंक की वसूली सूची में दिखाई देने लगें, तो यह विकास नहीं बल्कि नीति की विफलता का संकेत होगा।
सरकार, कृषि विभाग, सहकारी बैंक, वित्तीय संस्थानों और जनप्रतिनिधियों को मिलकर एक श्वेतपत्र जारी करना चाहिए, जिसमें ट्रैक्टर बिक्री, सब्सिडी, ऋण, एनपीए और किसानों की वास्तविक आय का जिला-वार विश्लेषण हो। पारदर्शिता ही किसानों का विश्वास लौटाएगी।
क्योंकि सवाल ट्रैक्टर का नहीं, उस किसान का है जो विकास के पहिए को आगे बढ़ाने की कोशिश में कहीं कर्ज के चक्र में तो नहीं फंसता जा रहा।

The Voice Live 24x7

The Voice Live 24x7 संपादक प्रोफाइल जीतेन्द्र ज्योतिषी वर्तमान में the voice के प्रधान सम्पादक के साथ 'झारखंड जर्नलिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन'के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं..