ऐतिहासिक मंगला हाट—इतिहास के पन्नों से ‘कीचड़’ के गड्ढों तक!
चाईबासा का ऐतिहासिक मंगला हाट, जो सिर्फ एक बाजार नहीं, बल्कि पूरे कोल्हान-सिंहभूम की धड़कन और उसकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत गवाह है। लेकिन आज इस ‘ऐतिहासिक’ धरोहर की हालत देखकर इतिहास भी शायद अपना मुंह छिपाने की कोशिश कर रहा होगा।
शुक्रवार को नगर परिषद अध्यक्ष नितिन प्रकाश दलबल के साथ मंगला हाट का ‘विस्तृत निरीक्षण’ करने निकले। तस्वीरें शानदार आईं, निर्देश भी उतने ही कड़क दिए गए—”सड़क और नाली मरम्मत का कार्य शीघ्र कराएं!” यह ‘शीघ्र’ शब्द हमारे प्रशासनिक शब्दकोश का इतना खूबसूरत गहना है कि इसके आने के बाद काम कब शुरू होगा, इसकी भविष्यवाणी स्वयं विधाता भी नहीं कर सकते।
जब इतिहास ‘मछली बाजार’ बन जाए!
कहने को तो मंगला हाट सिंहभूम का सबसे बड़ा और गौरवशाली बाजार है। लेकिन सालों से इसकी व्यवस्था देखकर लगता है कि नगर
प्रशासन इस ‘ऐतिहासिकता’ को कचरे के ढेरों और बजबजाती नालियों के नीचे सुरक्षित रखना चाहता था।
- अतिक्रमण का खेल: दुकानें सड़क पर हैं या सड़क दुकानों के बीच से रास्ता ढूंढ रही है, यह समझना शोध का विषय है।
- निकासी का ‘अनोखा’ तंत्र: जरा सी बारिश क्या हुई, यह ऐतिहासिक हाट वेनिस नगरी में तब्दील हो जाता है, जहां ग्राहकों को खरीदारी के लिए नाव की कमी खलने लगती है।
- खुशबू या बदबू?: मछली, मुर्गा और मटन दुकानों के लिए ‘स्थान चिन्हित’ होने की बात सालों से चल रही है। उम्मीद है इस बार यह सिर्फ फाइलों में चिन्हित न रहकर जमीन पर भी उतरेगा, ताकि बाजार आने वालों को नाक पर रुमाल न रखना पड़े।
ताली दोनों हाथों से बजती है: सिर्फ प्रशासन जिम्मेदार नहीं
इस पूरी अव्यवस्था के महायज्ञ में सिर्फ नगर परिषद ही ‘अकेली आहुति’ नहीं दे रही है, हमारे प्रबुद्ध दुकानदार भाई और आम नागरिक भी बराबर के पुण्य के भागीदार हैं।
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- दुकानदारों का ‘साम्राज्य’: दुकान की सीमा भले ही चार फीट हो, लेकिन सामान सड़क के बीचोबीच तक सजेगा। मानो सड़क नहीं, उनके ड्राइंग रूम का एक्सटेंशन हो!
- कचरा फेंकने की कला: डस्टबिन तो जैसे सिर्फ सजावट की वस्तु हैं। जब तक कचरा नाली के मुहाने पर न फेंका जाए, तब तक कुछ लोगों को आत्मसंतुष्टि ही नहीं मिलती।
मार्गदर्शन की एक छोटी सी खुराक:
व्यवस्था में सुधार केवल ‘अध्यक्ष महोदय के निरीक्षण’ और ‘कागजी निर्देशों’ से नहीं आएगा। जब तक दुकानदार भाई अपनी लक्ष्मण रेखा (दुकान की सीमा) तय नहीं करेंगे और आम जनता कचरे को सही ठिकाने पर लगाने का संकल्प नहीं लेगी, तब तक हर निरीक्षण सिर्फ एक अखबारी सुर्खी बनकर रह जाएगा।
अब कथनी नहीं, करनी का इंतजार
नगर परिषद अध्यक्ष नितिन प्रकाश जी की नीयत और सक्रियता पर संदेह नहीं है। उन्होंने नालियों की सफाई, सड़कों की मरम्मत और मांस-मछली बाजारों को व्यवस्थित करने का जो खाका खींचा है, वह स्वागत योग्य है।
लेकिन चाईबासा की जनता अब ‘निर्देश दिए गए’ वाली खबरों से थक चुकी है। सिंहभूम के इस सबसे बड़े और ऐतिहासिक मंगला हाट को अब ‘आश्वासन के पैचवर्क’ की नहीं, बल्कि ‘ठोस धरातलीय सुधार’ की जरूरत है। देखना यह है कि अगली बार जब पानी बरसेगा, तो मंगला हाट की नाली साफ मिलेगी या फिर से नगर परिषद के दावों की पोल बहती नजर आएगी!



