रेलवे रियायत खत्म करने के फैसले पर भड़के पत्रकार/लेखक , केंद्र से बहाली की मांग
रांची:- प्रदेश कांग्रेस की कोऑर्डिनेशन कमिटी के सदस्य एवं एडवोकेट हृदयानंद मिश्र ने इस मुद्दे को उठाते हुए इसे आंचलिक और ग्रामीण पत्रकारों के साथ ‘क्रूर मजाक’ बताया है।
आंचलिक पत्रकारों की कमर टूटी
लेखक हृदयानंद मिश्र ने अपने लेख में तर्क दिया है कि दिल्ली या बड़े महानगरों में बैठे पत्रकारों के विपरीत, आंचलिक पत्रकार बेहद सीमित संसाधनों में काम करते हैं। अधिकांश आंचलिक पत्रकार मानदेय या विज्ञापन कमीशन पर निर्भर हैं। उनके लिए रेलवे रियायत कोई लग्जरी नहीं, बल्कि अपना कर्तव्य निभाने का एक अनिवार्य माध्यम थी।
प्रमुख बिंदु:
- लोकतंत्र के प्रहरी की उपेक्षा: जब सांसद, विधायक और सरकारी अधिकारियों को यात्रा संबंधी सुविधाएं मिल सकती हैं, तो राष्ट्र और समाज के लिए कार्य करने वाले पत्रकारों को यह रियायत क्यों नहीं?
- ग्रामीण भारत की आवाज दबेगी: आर्थिक बोझ बढ़ने से पत्रकार दूरदराज के क्षेत्रों की खबरें कवर करने में असमर्थ होंगे, जिससे ग्रामीण भारत की आवाज राष्ट्रीय विमर्श से गायब हो जाएगी।
- बंधुआ मजदूरी जैसी स्थिति: कई पत्रकार अपनी जेब से यात्रा और संचार का खर्च उठाकर रिपोर्टिंग करते हैं। रियायत खत्म करना उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ है, जो उन्हें ‘बंधुआ मजदूर’ जैसी स्थितियों में धकेल रहा है।
सरकार से उठाई पुनर्विचार की मांग
लेखक ने चेतावनी दी है कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता केवल कानूनी अधिकारों पर टिकी नहीं होती, उसे आर्थिक और संस्थागत समर्थन की भी आवश्यकता होती है। यदि पत्रकार आर्थिक रूप से असुरक्षित होंगे, तो उनकी निष्पक्षता भी प्रभावित होगी।
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सरकार के सामने रखी गईं ये प्रमुख मांगें:
- पत्रकारों के लिए रेलवे रियायत को तत्काल प्रभाव से पुनः बहाल किया जाए।
- आंचलिक पत्रकारों के लिए विशेष कल्याणकारी योजनाएं शुरू हों।
- देशभर में पत्रकार सुरक्षा कानून और स्वास्थ्य बी
मा जैसी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
हृदयानंद मिश्र ने साफ कहा है कि पत्रकारों को सुविधाएं देना सरकार का कोई ‘उपकार’ नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए किया गया एक ‘निवेश’ है। यदि सरकार अभिव्यक्ति की आजादी के प्रति प्रतिबद्ध है, तो उसे जनहित में इस निर्णय पर तत्काल पुनर्विचार करना चाहिए।



