पेंशन की आस में उम्मीदें तोड़ रहे, पश्चिमी सिंहभूम के बुजुर्ग और विधवाएं, जुलाई में राहत की उम्मीद
चाईबासा: पश्चिमी सिंहभूम जिले के सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर शहरी मलिन बस्तियों तक, एक बड़ा वर्ग इन दिनों गहरी चिंता और लाचारी के बीच जीवन जीने को मजबूर है। यह वर्ग उन बुजुर्गों और विधवा महिलाओं का है, जिनके लिए सरकारी पेंशन ही जीवन की आखिरी और एकमात्र सहारा है। लेकिन, पिछले कुछ महीनों से पेंशन की अनियमितता ने उनके सामने पेट की आग बुझाने का संकट खड़ा कर दिया है।
ठिठकती सांसें और खाली झोलियां
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वृद्धावस्था की दहलीज पर खड़ी बुजुर्गों की लाचार आंखें हर महीने बैंक या डाकघर की ओर ताकती हैं। वहीं, पति की मृत्यु के बाद अकेले जीवन संघर्ष कर रहीं विधवाओं के लिए यह पेंशन महज पैसे नहीं, बल्कि सम्मान के साथ दो वक्त की रोटी की गारंटी है। चाईबासा के कई क्षेत्रों में ऐसे बुजुर्गों से बात करने पर पता चलता है कि कई महीनों से राशि न मिलने के कारण वे दवाइयों के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर हैं।
”दवा लें या राशन?”—यह सवाल आज जिले के हजारों बुजुर्गों की जुबान पर है। प्रशासनिक फाइलों की लेटलतीफी और तकनीक की पेचीदगियों ने इन जरूरतमंदों के जीवन को और भी कठिन बना दिया है।
क्या जुलाई में खत्म होगा इंतजार?
हालांकि, अब प्रशासनिक गलियारों से सकारात्मक संकेत मिल रहे हैं। सामाजिक सुरक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार, जुलाई माह में लंबित पेंशन राशि का भुगतान होने की प्रबल संभावना है। पेंशन भोगियों के चेहरे पर राहत की उम्मीदें तो जगी हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह राहत उन तक समय पर पहुंच पाएगी?



