सुरक्षा का कवच या राजकोष पर बोझ?
लोकतंत्र में ‘अति-विशिष्ट’ सेवा की भारी कीमत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद से ही ‘लाल बत्ती’ संस्कृति को समाप्त कर ‘EPI’ (Every Person is Important) यानी ‘हर व्यक्ति महत्वपूर्ण है’ का मंत्र दिया था। इस दिशा में प्रतीकात्मक सुधार तो हुए, लेकिन धरातल पर वीआईपी कल्चर का आर्थिक बोझ आज भी जस का तस बना हुआ है। झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले से सामने आए आंकड़े इस विडंबना की एक छोटी सी बानगी पेश करते हैं, जहाँ केवल दो पूर्व मुख्यमंत्रियों के काफिले के साथ प्रशासनिक प्रोटोकॉल के ईंधन पर अनुमानित 36 लाख रुपये सालाना खर्च हो रहे हैं।
यह व्यय केवल एक जिले का है। यदि इसी तर्ज पर पूरे झारखंड और फिर देशभर के 780 से अधिक जिलों का व्यापक आर्थिक विश्लेषण किया जाए, तो यह राशि अरबों में पहुँचती है। सवाल किसी व्यक्ति विशेष की सुरक्षा का नहीं है, बल्कि उस ‘सिस्टम’ का है जो पद से हटने के वर्षों बाद भी वीआईपी ठाठ-बाट को अनिवार्य मानता है।
अदृश्य व्यय और प्रशासनिक चुनौती
तकनीकी रूप से, वीआईपी सुरक्षा (SOP) के तहत भारी-भरकम गाड़ियों का काफिला, पायलट वाहन और एस्कॉर्ट गाड़ियाँ जरूरी मानी जाती हैं। लेकिन विचारणीय पक्ष यह है कि क्या हर पूर्व वीआईपी को उसी स्तर की सुरक्षा और संसाधनों की आवश्यकता है जो पद पर रहते हुए थी? पश्चिमी सिंहभूम जैसे आदिवासी बहुल और विकास की राह जोहते जिले में, जहाँ सड़कों और स्वास्थ्य केंद्रों के लिए बजट की कमी का रोना रोया जाता है, वहाँ केवल काफिलों के धुएं में लाखों रुपये उड़ा देना नैतिक रूप से भी तर्कसंगत नहीं लगता।
आर्थिक बोझ का राष्ट्रीय परिदृश्य
भारत जैसे विकासशील देश में, जहाँ प्रति व्यक्ति आय और बुनियादी सुविधाओं पर संघर्ष जारी है, वहां पूर्व मुख्यमंत्रियों, पूर्व मंत्रियों और अन्य वीआईपी के प्रोटोकॉल पर होने वाला खर्च एक ‘अदृश्य कर’ की तरह है जिसे आम जनता चुकाती है। अनुमान है कि देशभर में केवल वीआईपी ईंधन और परिवहन पर सालाना 250 से 300 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। यदि इसमें उनके आवास, कर्मचारी और सुरक्षाकर्मियों का वेतन जोड़ दिया जाए, तो यह आंकड़ा भयावह हो जाता है।
सुधार की आवश्यकता
समय आ गया है कि वीआईपी सुरक्षा की समीक्षा केवल राजनीतिक रसूख के आधार पर न होकर, वास्तविक ‘थ्रेट असेसमेंट’ (खतरे के आकलन) के आधार पर हो। सरकारी वाहनों के लिए ‘डिजिटल फ्यूल मॉनिटरिंग’ और ‘लॉग-बुक ऑडिट’ को और अधिक पारदर्शी बनाना होगा।
प्रधानमंत्री की घोषणाओं को सार्थकता तभी मिलेगी जब जिला प्रशासन से लेकर राज्य मुख्यालय तक वीआईपी खर्चों में कटौती की ठोस कार्ययोजना बनेगी। लोकतंत्र का असली सौंदर्य ‘अति-विशिष्ट’ सुविधाओं में नहीं, बल्कि उन संसाधनों को जनहित में मोड़ने में है। यदि हम केवल पूर्व वीआईपी के ईंधन खर्च में 50% की भी कटौती कर सकें, तो उस राशि से प्रतिवर्ष दर्जनों नए प्राथमिक विद्यालय या अस्पताल संचालित किए जा सकते हैं।
यह खर्च एक संकेत है कि हमें अपनी प्रशासनिक प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। सुरक्षा और सम्मान के नाम पर राजकोष की ‘असीमित बर्बादी’ को रोकने का समय आ गया है। जनता की गाढ़ी कमाई का एक-एक पैसा विकास के पहियों को घुमाने में लगना चाहिए, न कि वीआईपी काफिलों के पहियों में।



