डिजिटल छलांग और धरातल की चुनौतियां
नई दिल्ली के ‘नेशनल स्टेकहोल्डर्स कंसल्टेशन-2026’ में झारखंड सरकार द्वारा प्रस्तुत ‘एआई रोडमैप और विजन-2050’ राज्य के विकास क्रम में एक साहसिक और दूरगामी कदम है। एक ऐसे राज्य के लिए, जिसकी पहचान पारंपरिक रूप से केवल खनिज संसाधनों, घने जंगलों और आदिम संस्कृतियों से रही हो, उसका अचानक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के माध्यम से ‘देश का अग्रणी एआई राज्य’ बनने का दावा करना चौंकता भी है और एक नई उम्मीद भी जगाता है। आगामी पांच वर्षों में ₹1,150 करोड़ के निवेश का प्रस्ताव और रांची में 100 एकड़ से अधिक में प्रस्तावित आईटी पार्क यह साफ करते हैं कि सरकार अब शासन को पारंपरिक फाइलों से निकालकर डेटा-संचालित (Data-Driven) युग में ले जाने के लिए तैयार है।
इस रोडमैप के केंद्र में सुशासन (Governance) है। ‘मुख्यमंत्री डेटा इंटेलिजेंस प्लेटफॉर्म’ (CM-DIP), ‘हेल्थ एंड न्यूट्रिशन विजिलेंस सिस्टम’ (HNVS) और ‘क्रिटिकल मिनरल्स एडमिनिस्ट्रेशन सिस्टम’ (CMAS) जैसी पहलें यह दर्शाती हैं कि सरकार का ध्यान केवल कागजी घोषणाओं पर नहीं, बल्कि उन मोर्चों पर है जहां झारखंड को सबसे ज्यादा प्रशासनिक सुधार की जरूरत है। विशेषकर खनिज प्रशासन में एआई का उपयोग एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। यदि अवैध खनन और राजस्व की चोरी को डेटा विश्लेषण के जरिए रोका जा सका, तो राज्य के खजाने में होने वाली वृद्धि सीधे जनकल्याणकारी योजनाओं को रफ्तार देगी।
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लेकिन, किसी भी तकनीकी क्रांति की सफलता उसके ‘लॉन्च पैड’ से नहीं, बल्कि उसके ‘धरातल’ से तय होती है। विजन-2050 के तहत 1 लाख एआई-आधारित रोजगार और 1,000 स्टार्टअप्स का लक्ष्य सुनने में जितना आकर्षक है, व्यावहारिक रूप से उतना ही चुनौतीपूर्ण है। झारखंड वर्तमान में एक बड़े ‘डिजिटल डिवाइड’ (शहरी और ग्रामीण असमानता) से जूझ रहा है। जब हम पंचायत स्तर तक एआई सेवाएं पहुंचाने की बात करते हैं, तो हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राज्य के सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी बुनियादी नेटवर्क कनेक्टिविटी और निर्बाध बिजली की उपलब्धता एक बड़ा संघर्ष है।
दूसरी सबसे बड़ी चुनौती ‘कौशल अंतर’ (Skill Gap) की है। डेटा इंटेलिजेंस और एआई टूल्स को चलाने के लिए जिस स्तर के दक्ष मानव संसाधन की आवश्यकता होती है, क्या हमारा वर्तमान शैक्षणिक ढांचा उसे तैयार करने में सक्षम है? यदि सरकार शैक्षणिक संस्थानों के साथ साझेदारी और सरकारी अधिकारियों के क्षमता निर्माण पर युद्धस्तर पर काम नहीं करती, तो यह ₹1,150 करोड़ का ढांचा केवल कुछ हाई-टेक दफ्तरों तक ही सीमित रह जाएगा। इसके अलावा, एआई के बढ़ते उपयोग के साथ डेटा गोपनीयता और साइबर सुरक्षा के मोर्चे पर भी सरकार को अभेद्य नीति अपनानी होगी।
कुल मिलाकर, झारखंड सरकार की एआई नीति 2026-2031 एक स्वागत योग्य कदम है। यह नीति राज्य को पिछड़ेपन के पारंपरिक टैग से मुक्त कर एक ‘भविष्य-उन्मुख डिजिटल अर्थव्यवस्था’ बनाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति को दर्शाती है। नीति और विजन शानदार हैं, लेकिन नौकरशाही की लेत-लतीफी और धरातल की बुनियादी कमियां इस विजन की राह में रोड़ा न बनें, यह सुनिश्चित करना मुख्यमंत्री सचिवालय और नीति-नियंताओं की असली परीक्षा होगी। तकनीक केवल एक माध्यम है; असली सुशासन तभी कहलाएगा जब इसका सीधा लाभ राज्य के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को पारदर्शी और त्वरित रूप से मिले।




