अबुआ अखाडा
*
Post center
चाईबासा की शांत फिजाओं में इस रविवार वीआईपी सायरन और हुटरों की गूंज ने एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है। रविवार को चाईबासा मे मंत्री, सांसद, विधायको का जमावड़ा रहा, अवसर एक सरकारी आयोजन का रहा..!इस अवसर पर वाहनों के सायरन और हुटर कि गूंज गूंजी तो *यह महज शोर नहीं, बल्कि राजनीतिक वादों और हकीकत के बीच की गहरी खाई की अनुगूंज है।* सड़को पर गूंजते सायरन ने बरबस ही जनता को उन वादों की याद दिला दी जो सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ने के लिए ….राजनितिक दलो द्वारा किये गये थे वर्ष 2019 का विधानसभा चुनाव के दौर,चाईबासा को ‘उप-राजधानी’ बनाने का जो सपना जनता को दिखाया था, वह आज भी एक अधूरा अध्याय बनकर रह गया है। इससे इतर, तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा द्वारा सरायकेला को ‘सांस्कृतिक राजधानी’ बनाने का वादा भी इतिहास के पन्नों में वह भी कहीं खो गया। इसे चाईबासा/कोल्हान की जनता का यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि चुनाव के दौरान जो वादे ‘दृष्टिकोण’ विज़न की तरह पेश किए जाते हैं, चुनाव के बाद वे महज ‘नियति’ मानकर भुला दिए जाते हैं।*
आज यानि रविवार वर्तमान दौर मे जब शहर कि सड़को पर वीआईपी संस्कृति का सायरन बजा
तो चाईबासा की आम जनता के मन में एक तीखा प्रश्न कौंधता है— यदि चाईबासा उप-राजधानी होता, तो ये सायरन महज प्रोटोकॉल के स्वर नहीं होते बल्कि शासन की तत्परता के प्रतीक होते। अस्पताल से लेकर स्कूलों तक की बदहाल व्यवस्था के बीच! इन हुटरों की आवाज जनता को यह एहसास कराती है कि हम एक ऐसी राजधानी मे हैं जिसकी नींव सिर्फ वादों की स्याही से लिखी गई है। इसके उप राजधानी होने से कई समस्याए अपने आप खत्म हो जाती…. खैर यह सायरन अब चाईबासा के लिए केवल एक ध्वनि नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनाव का एक बड़ा ‘चुनावी मुद्दा’ बनने की दिशा में अग्रसर है।अब सवाल यह महत्वपूर्ण हैं कि क्या सत्ता के गलियारों से चाईबासा को वह दर्जा मिल पाएगा जिसका वादा किया गया था? क्या चाईबासा भविष्य मे झारखण्ड कि उप-राजधानी बन पायेगा….?
21 जून 2026 दिन रविवार को बजते हुये सायरन ने जनता को जगा दिया है कई जन समस्याओ के मद्देनज़र चाईबासा को अब एक ठोस उप-राजधानी के सरकारी ढांचे की दरकार है…..
*The वॉयस खास*
*अबुआ अखाडा*
के लिए
*Jitendra jyotishi*



