विकास का पुल या विकास की तस्वीर?
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चाईबासा/गुदड़ी: पश्चिमी सिंहभूम जिले का सुदूरवर्ती गुदड़ी प्रखंड आज भी विकास की बुनियादी चुनौतियों से जूझ रहा है। अनुमानतः 40 से 45 हजार की आबादी वाले इस प्रखंड में बड़ी संख्या में बिरसायत समुदाय के लोग निवास करते हैं, वहीं बिरहोर समुदाय के कई परिवार भी यहां रहते हैं। तत्कालीन बिहार से लेकर झारखंड राज्य गठन के बाद तक यह क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से जुड़ने की प्रतीक्षा करता रहा है।
मनोहरपुर विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले इस इलाके का लंबे समय तक प्रतिनिधित्व वर्तमान सिंहभूम सांसद जोबा मांझी ने किया है, जबकि वर्तमान में उनके पुत्र जगत मांझी यहां के विधायक हैं। इसके That’s स्थानीय लोगों और विभिन्न राजनीतिक दलों का आरोप है कि राज्य गठन के 26 वर्षों बाद भी गुदड़ी कई मामलों में “नो नेटवर्क, नो डेवलपमेंट” क्षेत्र बना हुआ है।
वर्ष 2014-15 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास के कार्यकाल में यहां प्रखंड कार्यालय का निर्माण अवश्य हुआ, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसकी उपयोगिता और प्रभावशीलता को लेकर आज भी सवाल उठाए जाते हैं।
विधायक और प्रशासनिक अमले का दौरा, तस्वीरों ने खींचा ध्यान
25 जून 2026 को स्थानीय विधायक पूरे प्रशासनिक अमले के साथ गुदड़ी प्रखंड के दूरस्थ इलाकों के दौरे पर पहुंचे। हालांकि इस दौरे की पूर्व सूचना मीडिया को उपलब्ध नहीं कराई गई थी, लेकिन दौरे के बाद जारी तस्वीरों में दिखाई दिया एक पुल क्षेत्रीय विकास की वास्तविक स्थिति पर चर्चा का विषय बन गया। स्थानीय लोगों का कहना है कि तस्वीरें स्वयं इलाके की चुनौतियों की कहानी बयां कर रही हैं।
“सड़क बनी, बिजली आई, लेकिन विकास नहीं दिखता”
जदयू जिला अध्यक्ष बिश्राम मुंडा का कहना है कि रघुवर दास सरकार के दौरान गुदड़ी को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के प्रयास किए गए थे। उनके अनुसार सड़कों का निर्माण हुआ और बिजली भी पहुंची, लेकिन वर्तमान समय में विकास का प्रभाव जमीन पर अपेक्षित रूप से दिखाई नहीं देता।
उन्होंने कहा कि पिछले दो वर्षों से सांसद और विधायक एक ही परिवार से हैं। ऐसे में लोगों को उम्मीद थी कि विकास कार्यों में तेजी आएगी, लेकिन वास्तविक स्थिति अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है।
मोबाइल नेटवर्क आज भी सबसे बड़ी समस्या
बिश्राम मुंडा के अनुसार प्रखंड के अधिकांश इलाकों में आज भी मोबाइल नेटवर्क की गंभीर समस्या बनी हुई है। कई बार सरकारी योजनाओं के संचालन में उपयोग होने वाली ई-पॉश मशीनों को भी नेटवर्क की तलाश करनी पड़ती है। उनका आरोप है कि कुछ कैंप कार्यालय नियमित रूप से संचालित भी नहीं हो रहे हैं।
वहीं भारतीय आदिवासी पार्टी के नेता सुशील बारला बताते हैं कि पिछले पांच से छह वर्षों से क्षेत्र में मोबाइल टावर और नेटवर्क सुविधा की मांग को लेकर लगातार आवेदन दिए जा रहे हैं। वर्तमान स्थिति यह है कि कई बार स्वयं प्रखंड कार्यालय परिसर में भी मोबाइल नेटवर्क काम नहीं करता, जिसके कारण कर्मचारियों को आवश्यक कार्यों के लिए लोढ़ाई जैसे अन्य क्षेत्रों का सहारा लेना पड़ता है। उन्होंने हमें गुदड़ी की सच्चाई बया करती कुछ तस्वीरे और पेपर कटिंग भेजी है
तुरतुज गांव अब भी देश-दुनिया से कटा
सुशील बारला के अनुसार गुदड़ी प्रखंड का तुरतुज गांव आज भी विकास की प्रतीक्षा कर रहा है। लगभग 300 से 400 की आबादी वाला यह गांव नदियों से घिरा हुआ है और यहां तक पहुंचना आज भी चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। उनका कहना है कि यह गांव लंबे समय से प्रभावी सड़क संपर्क से वंचित है, जिसके कारण यहां के लोग कई बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं।
बैंकिंग सुविधा के लिए 60 किलोमीटर की दूरी
स्थानीय लोगों का कहना है कि गुदड़ी प्रखंड में आज तक कोई राष्ट्रीयकृत बैंक शाखा स्थापित नहीं हो सकी है। ऐसे में ग्रामीणों को मजदूरी, पेंशन और अन्य बैंकिंग कार्यों के लिए लगभग 60 किलोमीटर दूर सोनुआ जाना पड़ता है। सीमित आय वाले ग्रामीणों के लिए यह अतिरिक्त आर्थिक और समयगत बोझ साबित होता है।
सुशील बारला का कहना है कि यदि अन्य विकास कार्यों में समय लगे तो भी कम से कम बेहतर सड़क, मजबूत संचार व्यवस्था और तुरतुज जैसे गांवों तक पहुंच मार्ग का निर्माण प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए।
उम्मीदें फिर जागीं
विधायक और जिला प्रशासन के संयुक्त दौरे के बाद स्थानीय सामाजिक संगठनों तथा विभिन्न राजनीतिक दलों में एक बार फिर उम्मीद जगी है। लोगों का मानना है कि यदि इस दौरे के बाद समस्याओं का वास्तविक आकलन कर ठोस कार्रवाई की जाती है तो गुदड़ी को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में सार्थक पहल संभव है।
अब देखना यह है कि वर्षों से नेटवर्क, सड़क, बैंकिंग और बुनियादी सुविधाओं की कमी झेल रहे गुदड़ी प्रखंड के लिए शासन और प्रशासन का यह दौरा केवल औपचारिकता साबित होता है या वास्तव में विकास की नई शुरुआत का आधार बनता है।





विकास का पुल या विकास की तस्वीर?
