The वॉयस खास…..अबुआ अखड़ा

‘दो कौड़ी’

गुरुजन का सम्मान या अपमान

आजकल देश के चीखने चिल्लाने चापलूसी करने वाले वैचारिक बाजार में शिक्षकों की ‘बाजारू कीमत’ तय करने का एक नया हुनर देखने को मिल रहा है। सरेआम किसी मंच से या सोशल मीडिया की चौपाल पर देश के निर्माताओं को ‘दो कौड़ी का’ कहकर नवाज दिया जाता है* इस पर खूब हंगामा बरस रहा है, टीवी चैनलों पर बहस की कौड़ियां उछाली जा रही हैं,*और शिक्षक समाज अपनी गरिमा को समेटकर कोने में बैठा यह सोच रहा है* कि जिस देश में कभी *’गुरु गोविंद दोऊ खड़े’* गाया जाता था, वहां अब ‘गुरु और कौड़ी’ का नया समीकरण सबसे तेज बनने वाले शख्स ने खोज निकाला है ?
*हम इस हंगामे और विवाद के बीच, जब हम इतिहास की धूल झाड़ते हैं, तो एक अजीब सा विरोधाभास सामने आता है* यह वही देश है, जहां की सबसे आलीशान और सबसे ऊंची कुर्सी—जिसे हम ‘राष्र्टपति भवन’ कहते हैं—वहां बैठने के लिए कभी ‘अकादमिक योग्यता’ और ‘शिक्षण के तजुर्बे’ को सबसे बड़ा आभूषण माना जाता था…..
जरा सोचिए, आज जिस शिक्षक कौम को ‘दो कौड़ी’ का बताकर खारिज करने की कोशिश की जा रही है, उसी कौम के एक प्रोफेसर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जब राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठते थे, तो पूरी दुनिया उनके ज्ञान के सामने नतमस्तक होती थी। उनके जन्मदिन को देश आज भी त्योहार की तरह मनाता है, भले ही साल के बाकी दिन शिक्षकों को ‘मानदेय’ और ‘बजट’ के तराजू पर तौला जाता रहे….
एक और ‘मास्टर साहब थे—डॉ. जाकिर हुसैन। जिन्होंने जामिया और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की बुनियाद को अपने खून-पसीने से सींचा और फिर देश के सर्वोच्च पद की शोभा बढ़ाई। *राजनीति में आने से पहले कॉलेज में ब्लैकबोर्ड पर चाक घिसने वाले प्रणब मुखर्जी भी इसी बिरादरी से थे, जिन्होंने बाद में देश की राजनीति के बड़े-बड़ों को अनुशासन का पाठ पढ़ाया और राष्ट्रपति बनते ही राजशाही का बोध कराती परम्परा महामहिम शब्द को राष्ट्रपति भवन की डिक्शनरी से हमेशा के लिए हटा दिया*
और हां, उस शख्स को तो देश कभी भूल ही नहीं सकता,*जिसने देश को मिसाइलें भी दीं और राष्ट्रपति भवन को बच्चों की पाठशाला बना दिया। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, जो राष्ट्रपति पद से हटने के अगले ही दिन झोला उठाकर आईआईएम के छात्रों को पढ़ाने चले गए थे।* उनकी तो अंतिम सांस भी देश के भविष्य को पाठ पढ़ाते हुए ही निकली थी..
पर आज विडंबना देखिए, जिस वर्ग ने देश को राष्ट्रपति दिए, नीतियां दीं, और लोकतंत्र को संभालने वाले नागरिक दिए, आज उसी वर्ग को ‘दो कौड़ी’ का साबित करने के लिए बयानवीरों में होड़ मची है… ऐसे मीडिया वीरो का हम *अबुआ अखाडा* ओर सख्त विरोध करते है और विनम्र आग्रह करते है आगे आप शिक्षा जगत को अपनी चापलूस और चाटुकारिता वाली राजनीति मे न घसीटे.. *चाटुकारिता का भाव भले आसमान छू रहा हो, वहां ईमानदारी से ज्ञान बांटने वाले शिक्षक की कीमत ‘दो कौड़ी’ की मत आंके गुरु के ज्ञान की कोई क़ीमत नहीं है और उसका कर्ज माँ के कर्ज की तरह कभी उतारा ही नहीं जा सकता है*..
खैर, विवाद करने वालों को करने दीजिए। सत्ता और बयानों के सूरज रोज उगते और ढलते हैं, लेकिन जब-जब देश का लोकतंत्र लड़खड़ाएगा, इसे संभालने के लिए किसी वातानुकूलित दफ्तर से नहीं, बल्कि किसी ‘दो कौड़ी’ के शिक्षक की क्लास से ही कोई कबीर, कोई कलाम या कोई राधाकृष्णन निकलकर सामने आएगा….

The वॉयस खास
अबुआ अखाडा
के लिए
Jitendra jyotishi

The Voice Live 24x7

The Voice Live 24x7 संपादक प्रोफाइल जीतेन्द्र ज्योतिषी वर्तमान में the voice के प्रधान सम्पादक के साथ 'झारखंड जर्नलिस्ट वेलफेयर एसोसिएशन'के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं..